भीड़
(१)
भीड़ में नहीं होती कविता
भीड़ में होता है कोलाहल
कविता अमृत है नहीं हलाहल
अमृत अकेला ही होता है
मात्र विष इकठ्ठे होते हैं ।
(२)
कवियों की भीड़
लेखकों की भीड़
आलोचकों की भीड़
पुरस्कारों की भीड़
पत्रिकाओं की भीड़
संस्थाओं की भीड़
नेताओं की भीड़
स्वयंसेवकों की भीड़
संतों की भीड़
मठों की भीड़
ज्ञानियों की भीड़
मूर्खों की भीड़
भूखों की भीड़
अघायों की भीड़
कारों की भीड़
बजारों की भीड़
चिमनियों की भीड़
धुओं की भीड़
पेड़ काटने वालों की भीड़
पेड़ लगाने वालों की भीड़
हिंसकों की भीड़
अहिंसकों की भीड़
धरती दब रही है
गगन ढक रहा है
शरीर बढ रहा है
आत्मा दब रही है
समाज बंट रहा है
सरोकार घट रहा है
सब कुछ लौट आयेगा
मन की शांति
आत्मा का आलोक
आसमान को वायु
धरती की आयु
पेड़ को फूल-फल
सूखे घाटों का जल
अगर जो कम हो जाये
ये चतुर्दिक भीड़
(३)
मैं जीवन भर
दौड़ता रहा
जब से इस धरती पर आया
स्कूल की पढाई में
खेल-कूद में
गीत-संगीत में
बाद के दिनों में
कालेज में
नौकरी में भी
परिवार के पीछे
पड़ोसियों के आगे
देश और सीमा से परे
मैं दौड़ता गया
मैं दौड़ता गया
भीड़ में खो गया
पर एक दिन
मैं रुक गया
लोगों ने मुड़ कर देखा
दौड़ने वालों ने
ठहरे हुए लोगों ने
यहां तक जिन्होंने
दौड़ना शुरु भी नहीं किया था
सबने मुझसे कहा
भीड़ में पिछड़ जाओगे
एक जगह हो जड़ जाओगे
यहां तक कि सड़ जाओगे
लेकिन मैं जो रुका तो हिला नहीं
लोग मुझे देखते, ठहरते
कुछ सोचते फिर आगे बढ जाते
कुछ समय के बाद
वे लोग मुझे फिर मिले
जो मुझे छोड़ आगे बढे
क्योंकि दुनिया गोल है
वे कहने लगे कि
तू अभी भी यहीं पड़ा है
कब से सड़ रहा है।
मैं मुस्कराया
कुछ हंसे, कुछ रोये
लेकिन मैं जानता था
कि भाग वे रहे थे
मैं नहीं ।
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Wednesday, July 21, 2010
Sunday, March 28, 2010
कला और युगबोध
आहत विश्व के प्रतिपल रुदन में
खींची मुस्कान की रेखा सस्मित ।
जग की व्यथा, निज के संतप्त मन में
नव चेतना ले कला हुई अवतरित ।
सृष्टि का चक्र जब से है चला
युग बदले और जग भी है बदला ।
मनुज कई बार गिरा, गिरकर सम्भला
गुफा से निकल अब अंतरिक्ष को निकला।
उंचे आदर्शों के उतंग शिखरों से
कवि, निकले तेरी ऐसी कविता धारा ।
फोड़ कर संकुचित वृत्ति के पाषाणों को
बहा ले जाये जो कलुषित विचार सारा ।
व्यक्त करना क्या उन्हें जो स्वयं मूर्त है
व्यक्त करो उन्हें जो सदा से अमूर्त है ।
रोको न उन्हें जो जीवन पथ में आगे बढ़े
जगाओ जिनकी चेतना अब तक सुप्त है।
दंगा, क्रू्रता और उत्पीड़न के पृष्ठों पर
चित्रकार, डालो प्रेम और स्नेह के रंग ।
तूलिका तेरी बन जाये अजेय शस्त्र
जीतो पशुता को मनुजता के संग संग ।
हो चुका रोना बहुत व्यतिक्रमों का
संगीतज्ञ, उठाओ तुम अब सितार ।
रहे न लालसा फिर जग में कुछ पाने का
सुनके जिस दिव्य राग को एक बार ।
ले कोमल भावों की मिट्टी, सरल सी कल्पना
मूर्तिकार, बना सौंदर्य की ऐसी कोई प्रतिमा ।
"गति ही जीवन है" बस असत्य हो जाये
भर दे उसमें चपला सी सजीव चपलता ।
२५ मई, १९९५
खींची मुस्कान की रेखा सस्मित ।
जग की व्यथा, निज के संतप्त मन में
नव चेतना ले कला हुई अवतरित ।
सृष्टि का चक्र जब से है चला
युग बदले और जग भी है बदला ।
मनुज कई बार गिरा, गिरकर सम्भला
गुफा से निकल अब अंतरिक्ष को निकला।
उंचे आदर्शों के उतंग शिखरों से
कवि, निकले तेरी ऐसी कविता धारा ।
फोड़ कर संकुचित वृत्ति के पाषाणों को
बहा ले जाये जो कलुषित विचार सारा ।
व्यक्त करना क्या उन्हें जो स्वयं मूर्त है
व्यक्त करो उन्हें जो सदा से अमूर्त है ।
रोको न उन्हें जो जीवन पथ में आगे बढ़े
जगाओ जिनकी चेतना अब तक सुप्त है।
दंगा, क्रू्रता और उत्पीड़न के पृष्ठों पर
चित्रकार, डालो प्रेम और स्नेह के रंग ।
तूलिका तेरी बन जाये अजेय शस्त्र
जीतो पशुता को मनुजता के संग संग ।
हो चुका रोना बहुत व्यतिक्रमों का
संगीतज्ञ, उठाओ तुम अब सितार ।
रहे न लालसा फिर जग में कुछ पाने का
सुनके जिस दिव्य राग को एक बार ।
ले कोमल भावों की मिट्टी, सरल सी कल्पना
मूर्तिकार, बना सौंदर्य की ऐसी कोई प्रतिमा ।
"गति ही जीवन है" बस असत्य हो जाये
भर दे उसमें चपला सी सजीव चपलता ।
२५ मई, १९९५
Sunday, January 31, 2010
कविता का कारखाना
कविता का भी जो अगर कारखाना होता
जहां हर दिन रची जातीं कवितायें
बाजार की मांग को ध्यान में रखकर
कच्चे माल की उपलब्धि,
कवियों का बाहुल्य
और कविता की खपत को नज़र में रखकर ही
खोले जातें कारखानें ।
सरकार से अनुदान में मिली जमीन
या फिर कर में मिली कटौती
बनती आधार किस राज्य या देश में
खोले जायें कारखाने ।
और भूमंडलीकरण के आज के समय में
क्या आर्थिक और सामाजिक असमानता
कविता के उत्पादन और विक्रय के
निर्णयों को प्रभावित नहीं करते ?
की जाती कवियों की नियुक्तियां
उनकी शिक्षा-दीक्षा, व्यक्तित्त्व
और उनके अनुभव के आधार पर ।
कहीं किया जाता अनुसंधान
कि कैसी होनी चाहिये कविता
कैसे उसकी मांग रखी जाये बरकरार
उपभोक्ताओं की अभिरूचि का आधार
कैसे हो कविता का विकास
रूप-रंग-रस और गंध नया
नया छंद और अलंकार नया ।
या फिर बदली जाती लोगों की अभिरूचियां
सिलसिलेवार और सुनिश्चित योजनाओं के तहत ।
रेडियों-दूरदर्शन और सिनेमाघरों में
नयी कविताओं के आते इश्तेहार
सस्ती और टिकाउं
लम्बी और पतली
सुन्दर और निर्दोष
ताजा और मोहक....
बच्चों-किशोरों-युवकों और बजुर्गों
हर उम्र के लोगों को लुभाने के लिये
होती हर तरह की कवितायें
सबके होते अपने विकल्प
हर कविता की अपनी कीमत होती
हर का होता अपना बाज़ार
हर रोज सुबह कवि आते
हाजिरी देने के बाद
कविता की उत्पादन रेखा पर
कल की पड़ी अधूरी कवितायें
पूरी की जातीं पहले
फिर नये लक्ष्य के आधार पर
शुरु होता कविता का उत्पादन
कविता के दोषों का निरीक्षण
और फिर निराकरण किया जाता
बाजार में भेजने से पहले।
कवियों को मिलती हर महीने मजदूरी
नहीं रहती फिर उनकी आर्थिक मजबूरी
नहीं होते प्रकाशकों के फंदे
या आलोचकों के लटके-झटके
उनके बच्चें भी जाते अच्छे स्कूल
घर में होता सुख और शुकून
कविता के कारखाने खोलने
आती बहुराष्ट्रीय कम्पनियां
देश में होता विदेशी निवेश
स्थानीय कवियों को मिलता अन्तर्राष्ट्रीय मंच
नयी शैली, नया कथ्य और शिल्प नया
नये मनोबल, नयी आकांक्षा और संकल्प नया।
कविताओं की होती छोटी-बड़ी दुकानें
खुल जाते बडे-बड़े माल
लोग अपनी-अपनी हसियत से
खरीद पाते अपनी पसंद की कवितायें।
खास मौसम या त्योहारों पर लगती
कविताओं की खास बिक्री (सेल)
कुछ पुरानी कम बिकने वाली कवितायें
निकाल दी जाती सस्ते दामों पर
और कुछ लोग अपनी हैसियत से
कहीं अधिक कीमत वाली
कवितायें खरीद पातें।
तब कुछ खास कविता को रख पाना
सामाजिक प्रतिष्ठा का चिह्न माना जाता।
और कुछ लोग उसे ललचायी दृष्टि से देखते।
आर्थिक मंदी के दिनों
जब कविता की मांग गिर जाती।
पहले बंद होती कुछ कविताओं का उत्पादन
फिर मंदी के और बढ़ जाने पर
बंद किये जाते कारखानें
छंटनी की जाती कवियों की
खर्चे में कटौती की मार
सबसे अधिक झेलती कविता
क्योंकि तब कविता
वह नहीं होती जो आज है।
*****
जहां हर दिन रची जातीं कवितायें
बाजार की मांग को ध्यान में रखकर
कच्चे माल की उपलब्धि,
कवियों का बाहुल्य
और कविता की खपत को नज़र में रखकर ही
खोले जातें कारखानें ।
सरकार से अनुदान में मिली जमीन
या फिर कर में मिली कटौती
बनती आधार किस राज्य या देश में
खोले जायें कारखाने ।
और भूमंडलीकरण के आज के समय में
क्या आर्थिक और सामाजिक असमानता
कविता के उत्पादन और विक्रय के
निर्णयों को प्रभावित नहीं करते ?
की जाती कवियों की नियुक्तियां
उनकी शिक्षा-दीक्षा, व्यक्तित्त्व
और उनके अनुभव के आधार पर ।
कहीं किया जाता अनुसंधान
कि कैसी होनी चाहिये कविता
कैसे उसकी मांग रखी जाये बरकरार
उपभोक्ताओं की अभिरूचि का आधार
कैसे हो कविता का विकास
रूप-रंग-रस और गंध नया
नया छंद और अलंकार नया ।
या फिर बदली जाती लोगों की अभिरूचियां
सिलसिलेवार और सुनिश्चित योजनाओं के तहत ।
रेडियों-दूरदर्शन और सिनेमाघरों में
नयी कविताओं के आते इश्तेहार
सस्ती और टिकाउं
लम्बी और पतली
सुन्दर और निर्दोष
ताजा और मोहक....
बच्चों-किशोरों-युवकों और बजुर्गों
हर उम्र के लोगों को लुभाने के लिये
होती हर तरह की कवितायें
सबके होते अपने विकल्प
हर कविता की अपनी कीमत होती
हर का होता अपना बाज़ार
हर रोज सुबह कवि आते
हाजिरी देने के बाद
कविता की उत्पादन रेखा पर
कल की पड़ी अधूरी कवितायें
पूरी की जातीं पहले
फिर नये लक्ष्य के आधार पर
शुरु होता कविता का उत्पादन
कविता के दोषों का निरीक्षण
और फिर निराकरण किया जाता
बाजार में भेजने से पहले।
कवियों को मिलती हर महीने मजदूरी
नहीं रहती फिर उनकी आर्थिक मजबूरी
नहीं होते प्रकाशकों के फंदे
या आलोचकों के लटके-झटके
उनके बच्चें भी जाते अच्छे स्कूल
घर में होता सुख और शुकून
कविता के कारखाने खोलने
आती बहुराष्ट्रीय कम्पनियां
देश में होता विदेशी निवेश
स्थानीय कवियों को मिलता अन्तर्राष्ट्रीय मंच
नयी शैली, नया कथ्य और शिल्प नया
नये मनोबल, नयी आकांक्षा और संकल्प नया।
कविताओं की होती छोटी-बड़ी दुकानें
खुल जाते बडे-बड़े माल
लोग अपनी-अपनी हसियत से
खरीद पाते अपनी पसंद की कवितायें।
खास मौसम या त्योहारों पर लगती
कविताओं की खास बिक्री (सेल)
कुछ पुरानी कम बिकने वाली कवितायें
निकाल दी जाती सस्ते दामों पर
और कुछ लोग अपनी हैसियत से
कहीं अधिक कीमत वाली
कवितायें खरीद पातें।
तब कुछ खास कविता को रख पाना
सामाजिक प्रतिष्ठा का चिह्न माना जाता।
और कुछ लोग उसे ललचायी दृष्टि से देखते।
आर्थिक मंदी के दिनों
जब कविता की मांग गिर जाती।
पहले बंद होती कुछ कविताओं का उत्पादन
फिर मंदी के और बढ़ जाने पर
बंद किये जाते कारखानें
छंटनी की जाती कवियों की
खर्चे में कटौती की मार
सबसे अधिक झेलती कविता
क्योंकि तब कविता
वह नहीं होती जो आज है।
*****
Wednesday, October 7, 2009
हिन्दी ग़ज़ल
(1)
हुस्न के जो ये नज़ारे नहीं होते
हम ये दिल कभी हारे नहीं होते।
चढ जाते जो सबके होठों पर
वो गीत फिर कंवारे नहीं होते।
तमाम नफ़रतों के बलबलों में
इश्क करने वाले सारे नहीं होते।
मात खायी है हमने तो हर्ज़ नहीं
प्यार करने वाले बेचारे नहीं होते।
जो जगमगाते हरदम उंचाई से
सब के सब सितारे नहीं होते।
दीखते दूर से मौजों के पार जो
ठहरे हुए सब किनारे नहीं होते।
इस दिल को यकीन ही था कब
कि लूटने वाले सहारे नहीं होते।
देना था दगा एक रोज आखिर
दोस्त, काश हम तुम्हारे नहीं होते।
(2)
ठोस भी कभी तरल हो जायेगा
मसला यह भी हल हो जायेगा।
फ़ागुन का रंग जो चढा कभी
चैती बैरागी विकल हो जायेगा।
सच एक था और रहेगा एक पर
अमृत तो कभी गरल हो जायेगा।
पहले से जो तुमने की तैयारियां
जीवन का पर्चा सरल हो जायेगा।
पाकर संग फूलों का एक दिन
कांटा भी कोमल हो जायेगा ।
(3)
हादसों का आशियाना आदमी
खुद से हुआ बेगाना आदमी ।
हर हसरत आखिरी थी लेकिन
हसरतों का ही निशाना आदमी।
दो फूल खिल उठे दामन में कभी
कांटों भरा बाग पुराना आदमी ।
चाहे रोते रहे या कि हंसते रहे
छेडता रहा नया तराना आदमी ।
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
बनता रहा अफ़साना आदमी ।
घर बनते रहे हर शहर में लेकिन
बिखरता हुआ पर ठिकाना आदमी।
(4)
नियति एक कुशल व्यापारी है
काम की खूब समझदारी है।
बेचती है खुशियां गिन गिनकर
फिर भी दुनिया गम की मारी है।
मिलते हैं लोग गले सरहद पर
घर में बंटने की पर बीमारी है।
अंधेरा हो घना भले जितना
जुगनू की चमक पर भारी है।
दिखावे का गुलशन है उनका
सच्ची अपने मन की क्यारी है।
(5)
सेवा का वो अवसर चाहते हैं
बदले में कार व घर चाहते हैं।
भले न हो पाय इस्तेमाल धन का
नये साल में नया कर चाहते हैं।
खुद घूमें बुलेट-प्रूफ़ कार में भले
देश हेतु जनता का सर चाहते हैं।
ढह रही सुरक्षा की दीवारे पर
ईंट के जबाब में पत्थर चाहते हैं।
चमक जायेगा एक दिन वतन अपना
चुनावी वादों का असर चाहते हैं ।
उडाना चाहते उंचे आकाश में
परिन्दे पर वे बे-पर चाहते हैं ।
(6)
आज वन से हरापन गया
कि जीवन से नयापन गया।
रिश्तों की बाढ आयी तो
उनका पर अपनापन गया।
घर में बने कमरे इतने
कि आंगन का खुलापन गया।
मिलाकर हिंदी में अंग्रेजी
बोली का पिछ्डापन गया।
प्रसाद की कामायनी गयी
निराला का निरालापन गया।
उंचे समाज में रहने वाले
बच्चों का तोतलापन गया।
भेडियों की बस्ती में आये
हाथी का मतवालापन गया।
(7)
बचपन का निर्मल मन गया
सोच से आज यौवन गया ।
छतें पडी शहर में इतनी कि
सबके सर से गगन गया ।
बहुत पाने के प्रयास में
बचा खुचा भी धन गया ।
सबका अपना-अपना कमरा
साझे का आंगन गया ।
हम हुये धर्मनिर्पेक्ष इतने
आरती गयी, हवन गया।
मेल जोल में वे आगे गये
तेरे मेरे में यह वतन गया।
आंख रह्ते अंधे हुये ही
उसपर मन का नयन गया।
सर्वाधिकार (Copyright) - अमरेन्द्र कुमार
हुस्न के जो ये नज़ारे नहीं होते
हम ये दिल कभी हारे नहीं होते।
चढ जाते जो सबके होठों पर
वो गीत फिर कंवारे नहीं होते।
तमाम नफ़रतों के बलबलों में
इश्क करने वाले सारे नहीं होते।
मात खायी है हमने तो हर्ज़ नहीं
प्यार करने वाले बेचारे नहीं होते।
जो जगमगाते हरदम उंचाई से
सब के सब सितारे नहीं होते।
दीखते दूर से मौजों के पार जो
ठहरे हुए सब किनारे नहीं होते।
इस दिल को यकीन ही था कब
कि लूटने वाले सहारे नहीं होते।
देना था दगा एक रोज आखिर
दोस्त, काश हम तुम्हारे नहीं होते।
(2)
ठोस भी कभी तरल हो जायेगा
मसला यह भी हल हो जायेगा।
फ़ागुन का रंग जो चढा कभी
चैती बैरागी विकल हो जायेगा।
सच एक था और रहेगा एक पर
अमृत तो कभी गरल हो जायेगा।
पहले से जो तुमने की तैयारियां
जीवन का पर्चा सरल हो जायेगा।
पाकर संग फूलों का एक दिन
कांटा भी कोमल हो जायेगा ।
(3)
हादसों का आशियाना आदमी
खुद से हुआ बेगाना आदमी ।
हर हसरत आखिरी थी लेकिन
हसरतों का ही निशाना आदमी।
दो फूल खिल उठे दामन में कभी
कांटों भरा बाग पुराना आदमी ।
चाहे रोते रहे या कि हंसते रहे
छेडता रहा नया तराना आदमी ।
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
बनता रहा अफ़साना आदमी ।
घर बनते रहे हर शहर में लेकिन
बिखरता हुआ पर ठिकाना आदमी।
(4)
नियति एक कुशल व्यापारी है
काम की खूब समझदारी है।
बेचती है खुशियां गिन गिनकर
फिर भी दुनिया गम की मारी है।
मिलते हैं लोग गले सरहद पर
घर में बंटने की पर बीमारी है।
अंधेरा हो घना भले जितना
जुगनू की चमक पर भारी है।
दिखावे का गुलशन है उनका
सच्ची अपने मन की क्यारी है।
(5)
सेवा का वो अवसर चाहते हैं
बदले में कार व घर चाहते हैं।
भले न हो पाय इस्तेमाल धन का
नये साल में नया कर चाहते हैं।
खुद घूमें बुलेट-प्रूफ़ कार में भले
देश हेतु जनता का सर चाहते हैं।
ढह रही सुरक्षा की दीवारे पर
ईंट के जबाब में पत्थर चाहते हैं।
चमक जायेगा एक दिन वतन अपना
चुनावी वादों का असर चाहते हैं ।
उडाना चाहते उंचे आकाश में
परिन्दे पर वे बे-पर चाहते हैं ।
(6)
आज वन से हरापन गया
कि जीवन से नयापन गया।
रिश्तों की बाढ आयी तो
उनका पर अपनापन गया।
घर में बने कमरे इतने
कि आंगन का खुलापन गया।
मिलाकर हिंदी में अंग्रेजी
बोली का पिछ्डापन गया।
प्रसाद की कामायनी गयी
निराला का निरालापन गया।
उंचे समाज में रहने वाले
बच्चों का तोतलापन गया।
भेडियों की बस्ती में आये
हाथी का मतवालापन गया।
(7)
बचपन का निर्मल मन गया
सोच से आज यौवन गया ।
छतें पडी शहर में इतनी कि
सबके सर से गगन गया ।
बहुत पाने के प्रयास में
बचा खुचा भी धन गया ।
सबका अपना-अपना कमरा
साझे का आंगन गया ।
हम हुये धर्मनिर्पेक्ष इतने
आरती गयी, हवन गया।
मेल जोल में वे आगे गये
तेरे मेरे में यह वतन गया।
आंख रह्ते अंधे हुये ही
उसपर मन का नयन गया।
सर्वाधिकार (Copyright) - अमरेन्द्र कुमार
Sunday, March 8, 2009
बदला लेने से क्या बदल जायेगा
कविता और कहानी में एक फ़र्क और भी है - कविता का टंकण (टाइपिंग) सरल और कहानी का मुश्किल । कहानी के हजारों शब्दों को टाइप करना अपने आप में एक प्रक्रम हो जाता है। पहले का मेरा सारा लिखा किसी दूसरे फांट में है और यही कारण है कि गद्द मुझे स्कैन करके देने पडे और पढने में आप सबको असुविधा हुई। लेकिन अब मैं जो भी लिख रहा हूं वह सब यूनिकोड में इसलिये वह सब आसानी से ब्लाग पर दे पाउंगा। बहरहाल, एक ताज़ा रचना प्रस्तुत है इसका स्वरूप/वर्ग क्या है इसका खुलासा भी अंतिम दो पंक्तियों में कर दिया है -
गुबार है दिल का निकल जायेगा
बदला लेने से क्या बदल जायेगा।
खिलौने जब तक है दुनिया में
मन तो बच्चा है मचल जायेगा।
सहलाते रहने से नासूर बनता है
कुरेदोगे तो कांटा निकल जायेगा।
जरूरी नहीं तोड लाओ चांद-सितारें
दिल मेरा ऐसे भी बहल जायेगा ।
छाछ भी फूंक कर पीते हैं लोग
जिसे जलना है वह जल जायेगा।
छीन लो बैसाखी गिरने दो उसको
आज नहीं तो कल सम्भल जायेगा।
तुम चाहे खेलो नफ़रत की होलियां
प्यार गुलाल का वह मल जायेगा।
मैंने तो सुनायी थी चंद पंक्तियां पर
कोई कविता कह कोई गज़ल जायेगा।
होली की असीम शुभकामनायें !!!
सर्वाधिकार: अमरेन्द्र कुमार
Copyright: Amarendra Kumar
२००९
गुबार है दिल का निकल जायेगा
बदला लेने से क्या बदल जायेगा।
खिलौने जब तक है दुनिया में
मन तो बच्चा है मचल जायेगा।
सहलाते रहने से नासूर बनता है
कुरेदोगे तो कांटा निकल जायेगा।
जरूरी नहीं तोड लाओ चांद-सितारें
दिल मेरा ऐसे भी बहल जायेगा ।
छाछ भी फूंक कर पीते हैं लोग
जिसे जलना है वह जल जायेगा।
छीन लो बैसाखी गिरने दो उसको
आज नहीं तो कल सम्भल जायेगा।
तुम चाहे खेलो नफ़रत की होलियां
प्यार गुलाल का वह मल जायेगा।
मैंने तो सुनायी थी चंद पंक्तियां पर
कोई कविता कह कोई गज़ल जायेगा।
होली की असीम शुभकामनायें !!!
सर्वाधिकार: अमरेन्द्र कुमार
Copyright: Amarendra Kumar
२००९
Saturday, February 28, 2009
क्षणिकायें
रात और दिन
रात झुक जाती है
दिन के कंधे पर
दिन उसे लिये फिरता है
फिर थक जाता है
रात की नींद खुल जाती है
दिन को थपकाती है
सहलाती और सुलाती है
खुद एक आंख में
सारी रात काट देती है
कौन कहता है कि
दिन का विलोम रात है।
उदासी और मुस्कान
मैंने जब भी पूछा
उसकी उदासी का कारण
उसने मुस्कराकर टाल दिया।
युद्ध और शांति
जीता जा सकता है
हर युद्ध को
लेकिन उसके लिये
शांति जरूरी है।
सर्दी और गर्मी
सर्दी की मुठ्ठी गर्म करते ही
गर्मी अपने आप चली आयी ।
सच और झूठ
सच और झूठ में
फ़र्क है सिर्फ़ इतना
सच अभी रूलाता है
झूठ बाद में। - हर्षा प्रिया
सच और झूठ
सच और झूठ में
फ़र्क है सिर्फ़ इतना
सच सच ही रहता है
लेकिन झूठ बदल जाता है।
आदमी और जानवर
आदमी और जानवर में
फ़र्क है।
जानवर जानवर को खाता है
आदमी जानवर और आदमी
दोनों को ही |
भक्त और भगवान
मैं भक्त हूं
और तुम भगवान
मैं तुम्हें जीत लूंगा ।
मैं भगवान हूं
और तुम भक्त
मैं हार जाऊंगा ।
धरती और स्वर्ग
रावण ने सोचा था
कि वह बनायेगा एक पुल
धरती और स्वर्ग के बीच ।
आज भी पुल बन रहे हैं
स्वर्ग भी है
लेकिन धरती कहां है ?
कवि और आलोचक
मैं कवि हूं
और तुम आलोचक
मैं आगे बढता हूं
तुम मेरा अनुसरण करते हो।
मैं आलोचक हूं
और तुम कवि
आगे तुम बढते हो
मैं तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करता हूं।
देवता और दानव
देवता ने जीता दानव को
बदले में
दानव ने जीत लिया
आज के आदमी को
देवता और दानव के बीच
आज भी यह संघर्ष जारी है।
मौन एक कविता
मौन एक कविता है
अगर जो कविता
सचमुच की कविता है।
शब्द उर्जा
शब्द उर्जा है
समझदारी से व्यय करो।
कहना और सुनना
बहुत कहने से
कहना तो हो जाता है।
लेकिन सुनना नहीं होता ।
मुक्ति की अभिलाषा
मुझे मुक्ति चाहिये
हर उस चीज से
जो बांधती है
मुझे मुक्ति मिल जायेगी
अगर जो मुक्त हो पाउं
मुक्त होने की अभिलाषा से।
दाग और खूबसूरती
चांद खूबसूरत है
इसलिये ही नहीं
कि उसके पास चांदनी है
पर इसलिये भी कि
उसमें दाग है
दाग खूबसूरती को बढा सकता है।
नया और पुराना
नया कुछ भी नहीं होता
जो होता है
वह पुराने से साक्षात्कार ।
राम और सीता
अगर जो मैं सीता नहीं
तुम भी तो नहीं राम
यही कारण है कि
अब कोइ राम नहीं होता
और न होती कोइ सीता ।
***********
कूकर और कडाही
इंडियन कूकर हूं
इसलिये सीटी बजाता हूं
अगर जो पसंद नहीं तो
बदल दो मुझको
अमेरिकन कूकर
या भारतीय कडाही से।
इंडियन और अमेरिकन कूकर
इंडियन कूकर हूं
इसलिये बज के रूक जाता हूं
अगर जो अमेरिकन होता
बजता ही रहता ....हर्षा प्रिया
कविता का राज़
घर में भी हो सकती है
कविता
अगर जो पत्नी
कवयित्री हो जाय !!!
सर्वाधिकार: अमरेन्द्र कुमार
Copyright: Amarendra Kumar
रात झुक जाती है
दिन के कंधे पर
दिन उसे लिये फिरता है
फिर थक जाता है
रात की नींद खुल जाती है
दिन को थपकाती है
सहलाती और सुलाती है
खुद एक आंख में
सारी रात काट देती है
कौन कहता है कि
दिन का विलोम रात है।
उदासी और मुस्कान
मैंने जब भी पूछा
उसकी उदासी का कारण
उसने मुस्कराकर टाल दिया।
युद्ध और शांति
जीता जा सकता है
हर युद्ध को
लेकिन उसके लिये
शांति जरूरी है।
सर्दी और गर्मी
सर्दी की मुठ्ठी गर्म करते ही
गर्मी अपने आप चली आयी ।
सच और झूठ
सच और झूठ में
फ़र्क है सिर्फ़ इतना
सच अभी रूलाता है
झूठ बाद में। - हर्षा प्रिया
सच और झूठ
सच और झूठ में
फ़र्क है सिर्फ़ इतना
सच सच ही रहता है
लेकिन झूठ बदल जाता है।
आदमी और जानवर
आदमी और जानवर में
फ़र्क है।
जानवर जानवर को खाता है
आदमी जानवर और आदमी
दोनों को ही |
भक्त और भगवान
मैं भक्त हूं
और तुम भगवान
मैं तुम्हें जीत लूंगा ।
मैं भगवान हूं
और तुम भक्त
मैं हार जाऊंगा ।
धरती और स्वर्ग
रावण ने सोचा था
कि वह बनायेगा एक पुल
धरती और स्वर्ग के बीच ।
आज भी पुल बन रहे हैं
स्वर्ग भी है
लेकिन धरती कहां है ?
कवि और आलोचक
मैं कवि हूं
और तुम आलोचक
मैं आगे बढता हूं
तुम मेरा अनुसरण करते हो।
मैं आलोचक हूं
और तुम कवि
आगे तुम बढते हो
मैं तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करता हूं।
देवता और दानव
देवता ने जीता दानव को
बदले में
दानव ने जीत लिया
आज के आदमी को
देवता और दानव के बीच
आज भी यह संघर्ष जारी है।
मौन एक कविता
मौन एक कविता है
अगर जो कविता
सचमुच की कविता है।
शब्द उर्जा
शब्द उर्जा है
समझदारी से व्यय करो।
कहना और सुनना
बहुत कहने से
कहना तो हो जाता है।
लेकिन सुनना नहीं होता ।
मुक्ति की अभिलाषा
मुझे मुक्ति चाहिये
हर उस चीज से
जो बांधती है
मुझे मुक्ति मिल जायेगी
अगर जो मुक्त हो पाउं
मुक्त होने की अभिलाषा से।
दाग और खूबसूरती
चांद खूबसूरत है
इसलिये ही नहीं
कि उसके पास चांदनी है
पर इसलिये भी कि
उसमें दाग है
दाग खूबसूरती को बढा सकता है।
नया और पुराना
नया कुछ भी नहीं होता
जो होता है
वह पुराने से साक्षात्कार ।
राम और सीता
अगर जो मैं सीता नहीं
तुम भी तो नहीं राम
यही कारण है कि
अब कोइ राम नहीं होता
और न होती कोइ सीता ।
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कूकर और कडाही
इंडियन कूकर हूं
इसलिये सीटी बजाता हूं
अगर जो पसंद नहीं तो
बदल दो मुझको
अमेरिकन कूकर
या भारतीय कडाही से।
इंडियन और अमेरिकन कूकर
इंडियन कूकर हूं
इसलिये बज के रूक जाता हूं
अगर जो अमेरिकन होता
बजता ही रहता ....हर्षा प्रिया
कविता का राज़
घर में भी हो सकती है
कविता
अगर जो पत्नी
कवयित्री हो जाय !!!
सर्वाधिकार: अमरेन्द्र कुमार
Copyright: Amarendra Kumar
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