Sunday, March 28, 2010

कला और युगबोध

आहत विश्व के प्रतिपल रुदन में
खींची मुस्कान की रेखा सस्मित ।
जग की व्यथा, निज के संतप्त मन में
नव चेतना ले कला हुई अवतरित ।

सृष्टि का चक्र जब से है चला
युग बदले और जग भी है बदला ।
मनुज कई बार गिरा, गिरकर सम्भला
गुफा से निकल अब अंतरिक्ष को निकला।

उंचे आदर्शों के उतंग शिखरों से
कवि, निकले तेरी ऐसी कविता धारा ।
फोड़ कर संकुचित वृत्ति के पाषाणों को
बहा ले जाये जो कलुषित विचार सारा ।

व्यक्त करना क्या उन्हें जो स्वयं मूर्त है
व्यक्त करो उन्हें जो सदा से अमूर्त है ।
रोको न उन्हें जो जीवन पथ में आगे बढ़े
जगाओ जिनकी चेतना अब तक सुप्त है।

दंगा, क्रू्रता और उत्पीड़न के पृष्ठों पर
चित्रकार, डालो प्रेम और स्नेह के रंग ।
तूलिका तेरी बन जाये अजेय शस्त्र
जीतो पशुता को मनुजता के संग संग ।

हो चुका रोना बहुत व्यतिक्रमों का
संगीतज्ञ, उठाओ तुम अब सितार ।
रहे न लालसा फिर जग में कुछ पाने का
सुनके जिस दिव्य राग को एक बार ।

ले कोमल भावों की मिट्टी, सरल सी कल्पना
मूर्तिकार, बना सौंदर्य की ऐसी कोई प्रतिमा ।
"गति ही जीवन है" बस असत्य हो जाये
भर दे उसमें चपला सी सजीव चपलता ।

२५ मई, १९९५

Sunday, January 31, 2010

कविता का कारखाना

कविता का भी जो अगर कारखाना होता
जहां हर दिन रची जातीं कवितायें

बाजार की मांग को ध्यान में रखकर
कच्चे माल की उपलब्धि,
कवियों का बाहुल्य
और कविता की खपत को नज़र में रखकर ही
खोले जातें कारखानें ।

सरकार से अनुदान में मिली जमीन
या फिर कर में मिली कटौती
बनती आधार किस राज्य या देश में
खोले जायें कारखाने ।

और भूमंडलीकरण के आज के समय में
क्या आर्थिक और सामाजिक असमानता
कविता के उत्पादन और विक्रय के
निर्णयों को प्रभावित नहीं करते ?

की जाती कवियों की नियुक्तियां
उनकी शिक्षा-दीक्षा, व्यक्तित्त्व
और उनके अनुभव के आधार पर ।

कहीं किया जाता अनुसंधान
कि कैसी होनी चाहिये कविता
कैसे उसकी मांग रखी जाये बरकरार
उपभोक्ताओं की अभिरूचि का आधार
कैसे हो कविता का विकास
रूप-रंग-रस और गंध नया
नया छंद और अलंकार नया ।

या फिर बदली जाती लोगों की अभिरूचियां
सिलसिलेवार और सुनिश्चित योजनाओं के तहत ।

रेडियों-दूरदर्शन और सिनेमाघरों में
नयी कविताओं के आते इश्तेहार
सस्ती और टिकाउं
लम्बी और पतली
सुन्दर और निर्दोष
ताजा और मोहक....

बच्चों-किशोरों-युवकों और बजुर्गों
हर उम्र के लोगों को लुभाने के लिये
होती हर तरह की कवितायें
सबके होते अपने विकल्प
हर कविता की अपनी कीमत होती
हर का होता अपना बाज़ार


हर रोज सुबह कवि आते
हाजिरी देने के बाद
कविता की उत्पादन रेखा पर
कल की पड़ी अधूरी कवितायें
पूरी की जातीं पहले
फिर नये लक्ष्य के आधार पर
शुरु होता कविता का उत्पादन
कविता के दोषों का निरीक्षण
और फिर निराकरण किया जाता
बाजार में भेजने से पहले।

कवियों को मिलती हर महीने मजदूरी
नहीं रहती फिर उनकी आर्थिक मजबूरी
नहीं होते प्रकाशकों के फंदे
या आलोचकों के लटके-झटके
उनके बच्चें भी जाते अच्छे स्कूल
घर में होता सुख और शुकून

कविता के कारखाने खोलने
आती बहुराष्ट्रीय कम्पनियां
देश में होता विदेशी निवेश
स्थानीय कवियों को मिलता अन्तर्राष्ट्रीय मंच
नयी शैली, नया कथ्य और शिल्प नया
नये मनोबल, नयी आकांक्षा और संकल्प नया।

कविताओं की होती छोटी-बड़ी दुकानें
खुल जाते बडे-बड़े माल
लोग अपनी-अपनी हसियत से
खरीद पाते अपनी पसंद की कवितायें।

खास मौसम या त्योहारों पर लगती
कविताओं की खास बिक्री (सेल)
कुछ पुरानी कम बिकने वाली कवितायें
निकाल दी जाती सस्ते दामों पर
और कुछ लोग अपनी हैसियत से
कहीं अधिक कीमत वाली
कवितायें खरीद पातें।

तब कुछ खास कविता को रख पाना
सामाजिक प्रतिष्ठा का चिह्न माना जाता।
और कुछ लोग उसे ललचायी दृष्टि से देखते।

आर्थिक मंदी के दिनों
जब कविता की मांग गिर जाती।
पहले बंद होती कुछ कविताओं का उत्पादन
फिर मंदी के और बढ़ जाने पर
बंद किये जाते कारखानें
छंटनी की जाती कवियों की
खर्चे में कटौती की मार
सबसे अधिक झेलती कविता
क्योंकि तब कविता
वह नहीं होती जो आज है।

*****

Sunday, November 15, 2009

क्षितिज - एक प्रयोग


आज से छ: साल पहले जब क्षितिज के सम्पादन और प्रकाशन की शुरुआत हुई थी तब कोई बहुत बड़ी महत्त्वाकांक्षा नहीं थी इसके पीछे। खेल-खेल में शुरु हुई इस लघु पत्रिका ने प्रयोगों, गुणवत्ता और स्तरीयता के नये आयाम स्थापित किये। दो साल के अंदर यह पत्रिका अमेरिका से निकलकर मध्यपूर्व, भारत और यूरोप होते हुए सिंगापुर, आस्ट्रेलिया और जापान तक पहुंची। लोगों ने इसे सराहा, सहयोग दिया और इसके प्रचार-प्रसार में मदद की। एक साल के बाद २००४ में इसका वार्षिकांक प्रिन्ट रूप में प्रकाशित हुआ। एक साथ प्रिन्ट और ईलेक्ट्रानिक रूप में इसका प्रकाशन २००५ के अंत तक कायम रहा। उसके एक साल बाद तक सिर्फ़ ईलेक्ट्रानिक/वेब रूप में इसका प्रकाशन २००६ तक जारी रहा। आज भी यदा-कदा लोगों के पत्र, रचनायें और फोन आते हैं क्षितिज के प्रकाशन के सम्बंध में। बहुत लोगों ने अनुरोध भी किया कि इसका प्रकाशन फिर से प्रारम्भ करें। लेकिन इसको फिर से शुरु नहीं करने के सम्बंध में मुझे बहुत सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह चर्चा एक ऐसे संदर्भ की तरफ हमें ले जाती है जहां हिंदी की लघुपत्रिकाओं का बड़ा संघर्ष, हिन्दी भाषा और उसके लेखक/पाठक/प्रकाशक का वर्तमान और भविष्य शामिल है। यह एक बड़ा विषय है और इस पर आम तौर पर चर्चा चलती रहती है। मेरा मानना है कि हम चर्चा करने और समस्याओं को खड़ी करने में दक्ष हैं। दूसरे शब्दों में अगर कहें तो हम समस्या उन्मूलक नहीं वरन समस्याजीवी हैं। राजनीति के लिये यह प्रवृति समीचीन है। अगर समस्या नहीं हो तो समाधान करने वालों की आवश्यकता ही नहीं होगी। ऐसे में उनका अस्तित्त्व खतरें में पड़ जायेगा। धीरे-धीरे यही प्रवृति भाषा और साहित्य में आ गयी। इसके कारणों की छानबीन मैं इसके विशेषज्ञों पर छोड़ता हूं। कुछ बातें जो मेरी दृष्टि में गुजरी हैं उनमें से प्रमुख हैं -
१. हिंदी में पत्रिकाओं की तादाद आवश्यकता से ज्यादा है।
२. जहां तादाद ज्यादा है गुणवत्ता और स्तरीयता की भारी कमी है।
३. हिंदी पढ‍ने और लिखने के प्रति लोगों का रुझान तेजी से गिरा है। लिखने वाले ही आपस में पढ रहे हैं। शुद्ध पाठक वर्ग लगभग लुप्तप्राय हो गया है।
४. लेखन-पठन-पाठन-सम्पादन-प्रकाशन हर जगह अनुशासन की भारी कमी है।
५. पूरी प्रक्रिया भविष्योन्मुखी न होकर अतीत के गुणगान और वर्तमान के रोने में अटकी पड़ी है।
६. नये प्रयोगों और शिल्प का भारी अभाव है।





क्षितिज - कुछ तथ्य

सितम्बर २००३ - क्षितिज का पहला अंक प्रकाशित (पीडीएफ फाईल/द्विमासिक ई-पत्रिका)
अगस्त २००४ - क्षितिज का वार्षिकांक प्रकाशित (प्रिंट और ईलेक्ट्रानिक दोनों रूप में त्रैमासिक पत्रिका उपलब्ध)
अक्तूबर २००४ - क्षितिज इंकार्पोरेटेड का पंजीकरण एक अलाभकारी संस्था के रूप में
जनवरी २००५ - क्षितिज का वेबसाईट प्रकाशित / क्षितिज के सभी अंक वेब पर उपलब्ध
जनवरी २००६ - क्षितिज का सिर्फ ईलेक्ट्रानिक प्रकाशन जारी
दिसम्बर २००६ - क्षितिज का १६ वां और आखिरी अंक प्रकाशित
संस्थापक-सम्पादक - अमरेन्द्र कुमार
कला-सम्पादक - हर्षा प्रिया सिन्हा

क्षितिज - कुछ वैशिष्टय
१. पी.डी.एफ फाईल में सम्भवत: हिंदी की पहली ईलेक्ट्रानिक पत्रिका प्रकाशित (२००३)
२. कला-वीथिका का समावेश / कला (रेखांकन/चित्र) और साहित्य की संतुलित प्रस्तुति
३. सभी उम्र के कलाकारों और लेखकों का समावेश - एक ही अंक में ५ से ७५ वर्ष के लेखक/कलाकार सम्मिलित
४. साहित्य-कला के साथ-साथ विज्ञान-अभियंत्रण-प्रबंध सम्बंधित विषयों पर आलेख सम्मिलित
५. वैश्विक भागीदारी और वितरण (अमेरिका से सिंगापुर-आस्ट्रेलिया तक)
६. क्षितिज के प्रत्येक अंक का एक वरिष्ठ साहित्यकार को समर्पित होना
७. विभिन्न विधाओं और क्षेत्रों में योगदान देने के लिये १२ "क्षितिज सम्मान" का आरम्भ

अगर आप क्षितिज के किसी अंक को देखना-पढना चाहें तो मुझे सम्पर्क कर सकते हैं।

Wednesday, October 7, 2009

हिन्दी ग़ज़ल

(1)

हुस्न के जो ये नज़ारे नहीं होते
हम ये दिल कभी हारे नहीं होते।

चढ जाते जो सबके होठों पर
वो गीत फिर कंवारे नहीं होते।

तमाम नफ़रतों के बलबलों में
इश्क करने वाले सारे नहीं होते।

मात खायी है हमने तो हर्ज़ नहीं
प्यार करने वाले बेचारे नहीं होते।

जो जगमगाते हरदम उंचाई से
सब के सब सितारे नहीं होते।

दीखते दूर से मौजों के पार जो
ठहरे हुए सब किनारे नहीं होते।

इस दिल को यकीन ही था कब
कि लूटने वाले सहारे नहीं होते।

देना था दगा एक रोज आखिर
दोस्त, काश हम तुम्हारे नहीं होते।

(2)

ठोस भी कभी तरल हो जायेगा
मसला यह भी हल हो जायेगा।

फ़ागुन का रंग जो चढा कभी
चैती बैरागी विकल हो जायेगा।

सच एक था और रहेगा एक पर
अमृत तो कभी गरल हो जायेगा।

पहले से जो तुमने की तैयारियां
जीवन का पर्चा सरल हो जायेगा।

पाकर संग फूलों का एक दिन
कांटा भी कोमल हो जायेगा ।


(3)

हादसों का आशियाना आदमी
खुद से हुआ बेगाना आदमी ।

हर हसरत आखिरी थी लेकिन
हसरतों का ही निशाना आदमी।

दो फूल खिल उठे दामन में कभी
कांटों भरा बाग पुराना आदमी ।

चाहे रोते रहे या कि हंसते रहे
छेडता रहा नया तराना आदमी ।

लोग आते रहे, लोग जाते रहे
बनता रहा अफ़साना आदमी ।

घर बनते रहे हर शहर में लेकिन
बिखरता हुआ पर ठिकाना आदमी।

(4)
नियति एक कुशल व्यापारी है
काम की खूब समझदारी है।

बेचती है खुशियां गिन गिनकर
फिर भी दुनिया गम की मारी है।

मिलते हैं लोग गले सरहद पर
घर में बंटने की पर बीमारी है।

अंधेरा हो घना भले जितना
जुगनू की चमक पर भारी है।

दिखावे का गुलशन है उनका
सच्ची अपने मन की क्यारी है।

(5)

सेवा का वो अवसर चाहते हैं
बदले में कार व घर चाहते हैं।

भले न हो पाय इस्तेमाल धन का
नये साल में नया कर चाहते हैं।

खुद घूमें बुलेट-प्रूफ़ कार में भले
देश हेतु जनता का सर चाहते हैं।

ढह रही सुरक्षा की दीवारे पर
ईंट के जबाब में पत्थर चाहते हैं।

चमक जायेगा एक दिन वतन अपना
चुनावी वादों का असर चाहते हैं ।

उडाना चाहते उंचे आकाश में
परिन्दे पर वे बे-पर चाहते हैं ।

(6)


आज वन से हरापन गया
कि जीवन से नयापन गया।

रिश्तों की बाढ आयी तो
उनका पर अपनापन गया।

घर में बने कमरे इतने
कि आंगन का खुलापन गया।

मिलाकर हिंदी में अंग्रेजी
बोली का पिछ्डापन गया।

प्रसाद की कामायनी गयी
निराला का निरालापन गया।

उंचे समाज में रहने वाले
बच्चों का तोतलापन गया।

भेडियों की बस्ती में आये
हाथी का मतवालापन गया।


(7)

बचपन का निर्मल मन गया
सोच से आज यौवन गया ।

छतें पडी शहर में इतनी कि
सबके सर से गगन गया ।

बहुत पाने के प्रयास में
बचा खुचा भी धन गया ।

सबका अपना-अपना कमरा
साझे का आंगन गया ।

हम हुये धर्मनिर्पेक्ष इतने
आरती गयी, हवन गया।

मेल जोल में वे आगे गये
तेरे मेरे में यह वतन गया।

आंख रह्ते अंधे हुये ही
उसपर मन का नयन गया।

सर्वाधिकार (Copyright) - अमरेन्द्र कुमार

Monday, September 21, 2009

सर्वेक्षण - प्रवासी साहित्य

पिछले सर्वेक्षण का विषय था - हिन्दी भाषा एवं साहित्य - संकट और संभावना । उसमें पूछे गये प्रश्नों के जो उत्तर मिलें उसके आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। संगीता पुरी जी ने अवश्य लिखा कि हिन्‍दी की अवनति के सबसे बडे कारण तो पाठक की कमी होनी चाहिए। उत्तर नहीं मिले उसके कई कारण हो सकते हैं। खैर, इस प्रक्रिया को जारी रखते हुए इस बार के सर्वेक्षण का विषय मैंने चुना है - प्रवासी साहित्य। पिछले कुछ समय से "प्रवासी" शब्द भारतीय जनमानस में कई कारणों से ध्यानाकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। जाहिर है साहित्य भी इससे अछूता नहीं। लघु पत्रिकाओं का प्रवासी अंक निकाला जाना, प्रवासियों के लिये पत्रिकाओं का प्रकाशन, प्रवासी सम्मेलन, प्रवासी पुरस्कार आदि "प्रवासी" की सत्ता और महत्ता को इंगित करते हैं। क्या है यह प्रवासी और प्रवासी साहित्य ? आईये जानें आपके विचार..

प्रश्न १ . आपकी दृष्टि में प्रवासी साहित्य क्या है ?
क) विदेश में बसे भारतीय (प्रवासी) द्वारा रचित साहित्य
ख) विदेश के परिवेश को रेखांकित करता साहित्य
ग) प्रवासी साहित्य जैसा कुछ होता नहीं
घ) अन्य (अपने विचार ५०-१०० शब्दों में प्रगट करें)

प्रश्न २ . आपकी दृष्टि में क्या प्रवासी साहित्य को भारत में रचे जा रहे साहित्य से अलग देखा जाना चाहिये ?
क) हां - क्योंकि तब उसका एक अलग मापदंड के तहत मूल्यांकन किया जा सकता है
ख) हां - क्योंकि प्रवासी परिवेश को समझने के लिये यह आवश्यक है
ग) नहीं - क्योंकि साहित्य साहित्य होता है देशी या प्रवासी नही
घ) अन्य (अपने विचार ५०-१०० शब्दों में प्रगट करें)

प्रश्न ३ . आपकी दृष्टि में प्रवासी साहित्य का स्तर कैसा है ?
क) उच्च
ख) साधारण
ग) निम्न
घ) अन्य (अपने विचार ५०-१०० शब्दों में प्रगट करें)

प्रश्न ४. आपकी दृष्टि में भारत में रचे जा रहे साहित्य की तुलना में प्रवासी साहित्य किस स्तर का है ?
क) बेहतर
ख) समकक्ष
ग) निम्न
घ) तुलना का कोई अर्थ नहीं
च) अन्य (अपने विचार ५०-१०० शब्दों में प्रगट करें)

एक बार फिर आपकी भागीदारी की अपेक्षा है। आप अपने मित्रों-परिचितों को भी इसमें भाग लेने के लिये प्रेरित कर सकते हैं।
सर्वेक्षण में भाग लेते समय निम्न बातों पर ध्यान दें -
१. यह आपकी स्वेच्छा है।
२. यह विचारों के विनिमय का मंच है हार-जीत का नहीं।
३. पूर्वाग्रहों, वैचारिक दृढता और अतिशयता से बचें ।
४. आप अपने उत्तर अगर सार्वजनिक रूप से प्रगट नहीं करना चाहें तो मुझे मेरे निजी ई-मेल पर भेज सकते है - amarendrak03@yahoo.com (कृपया ध्यान दें - 3 से पहले "शून्य" है)
5. इसका संदर्भ सार्वजनिक, सार्वदेशिक और सार्वकालिक है।
६. प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर सम्भव हैं और अंतिम विकल्प के रूप अपने विचार ५०-१०० शब्दों में प्रगट कर सकते हैं।

Sunday, August 23, 2009

सम्पर्क

पिछले कुछ दिनों हिंदी के तीन प्रमुख साहित्यकारों से सम्पर्क का सौभाग्य मिला - उदय प्रकाश जी, डा. कमल किशोर गोयंका जी और उषा प्रियम्वदा जी।
================================
मेरे लिखे एक ई-मेल के उत्तर में उदय जी ने लिखा -

Friday, May 1, 2009
प्रिय अमरेन्द्र जी,
आपका पत्र पाकर बहुत प्रसन्नता हुई . इस पत्र के माध्यम से आपसे परिचित होना भी सुखद था. आपका ब्लाग भी मैंने देखा. अब पेंगुइन से प्रकाशित आपका संग्रह पढ़ने की इच्छा जागृत हुई हैं. ज़ल्द ही मैं इसे प्राप्त करूँगा क्यों की वहां से मेरी भी ४-५ किताबें है.
और आप कैसे है? यह सचमुच बहुत सुखद हैं कि आप अपनी भाषा, देश और साहित्य से इतनी दूर रह कर भी जुड़े है.
शुभकामनाओं के साथ.
उदय प्रकाश
***************

मेरा भेजा ई-मेल -


2009/4/28
उदय प्रकाश जी,
नमस्ते !
आशा है कि आप सकुशल और सानंद होंगे।
आपके नाम से पहले मैं परिचित था और अब आपके ब्लाग को भी पढता रहता हूं। अच्छा लगता है। आपकी पुस्तकें पढने का बहुत मौका मिला नहीं है लेकिन "पीली छतरी वाली लड़की पाकिस्तान में" के अंग्रेजी अनुवाद की समीक्षा पढी तो आपके रचना-कर्म के सम्बंध में जानकारी मिली।
मैं अमेरिका में रहकर काम करता हूं। साथ ही हिंदी लेखन से भी जुडा हूं। मेरा पहला कहानी संग्रह "चूडीवाला और अन्य कहानियां" पेंगुइन इंडिया से २००७ में प्रकाशित हुआ है। आजकल ब्लाग भी लिखने का प्रयास करता हूं समय मिलने पर।
http://amarendrahwg.blogspot.com/
कभी अवकाश मिले तो देखें और अपने विचार दें।

शेष कुशल है।

सादर,

अमरेन्द्र कुमार

*************
उदय प्रकाश जी हिंदी के लब्ध-प्रतिष्ठित कथाकार और उपन्यासकार हैं। उनका अपना ब्लाग है अगर आप देखना और पढना चाहें -
http://uday-prakash.blogspot.com/

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डा. कमल किशोर गोयंका जी ने मेरी पुस्तक "चूडीवाला और अन्य कहानियां" पढने के बाद दिल्ली से मुझे फोन किया। थोडी देर बात करने के बाद मैंने उन्हें फोन किया और लगभग आधे घंटे हमारी बातचीत हुई। पुस्तक की प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने कहा कि "चूडीवाला" एक सशक्त कहानी है और उसे वही लिख सकता है जो उस पृष्ठभूमि से परिचित है। हमारी चर्चाओं में आपसी परिचय के अतिरिक्त धीरे-धीरे बहुत कुछ शामिल हो गये - प्रवासी साहित्य, हिंदी-अंग्रेजी सम्बंध, भारत और विदेश (खासकर अमेरिका), हिंदी लघु पत्रिकाओं की वर्तमान दशा, विदेशों में हिंदी प्रसार, भाषा-लेखक-पाठक त्रयी आदि। उन सभी बातों का ब्यौरा तो अक्षरश: सम्भव नहीं लेकिन कुछ मुख्य बातों को प्रगट करना चाहूंगा। प्रवासी साहित्य को लेकर उनके विचार बहुत ही साकारात्मक हैं। अपने लेखों और वक्तव्यों के माध्यम से भी उन्होंने प्रवासी साहित्य को हरदम सराहा है और भारत के साहित्यकारों से उन्हें हिंदी साहित्य की मुख्यधारा से जोडने की अपील की है। बातचीत के प्रारम्भ में उन्होंने बताया कि प्रेमचंद साहित्य पर उनकी लिखी बाईस पुस्तकें हैं। वे सम्प्रति सेवानिवृत हैं और दिल्ली के साकेत कालोनी में निवास करते हैं। उन्होंने बताया कि वे वर्ष २००७ में न्यूयार्क में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने आये थे। उन्होंने मुझे कहा कि आप नियमित लिखते रहें और पुस्तकों का प्रकाशन भी नियमित कराते रहें। अच्छे लेखन के लिये ये आवश्यक शर्त हैं और इनपर ध्यान देना जरूरी है। भारत के बाहर बसे लेखकों के लिये उनका सुझाव है कि वे भारत की मुख्यधारा साहित्य का गहन अध्ययन करें। इसके लिये एक पुस्तक-क्लब की स्थापना का उन्होंने सुझाव दिया। इसके लिये सहयोग के रूप में भारत से पुस्तक भेजने की व्यवस्था का कार्यभार लेने की पेशकश भी उन्होंने की। उनका मानना है कि यह आने वाली पीढी के लिये भी भारत की संस्कृति से जोडने में कारगर साबित होगा। बातचीत के क्रम में मेरे बताने के बाद उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि "क्षितिज" के चार साल के प्रकाशन के बाद उनकों इस बात की जानकारी नहीं मिली। इस संदर्भ में उनकी जागरूकता और उत्सुकता देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। अंत में उन्होंने सम्पर्क में रहने का आग्रह किया जो आज के समय के लिये सुखद और समीचीन है। यह इसलिये भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि साहित्यकारों की दो पीढियों को जोडना या उनसे जुडना कम होता जा रहा है।

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उषा प्रियम्वदा जी ने मेरी पुस्तक की प्रतिक्रिया स्वरूप एक पत्र लिखा जिसका एक अंश यहां दे रहा हूं -


उषा प्रियम्वदा जी हिंदी की लब्ध-प्रतिष्ठित कथाकार-उपन्यासकार हैं और अमेरिका के मैडिसन, विस्कांसिन में रहती हैं।

Sunday, July 19, 2009

हिन्दी भाषा एवं साहित्य - संकट और संभावना

वर्तमान समय को अगर हिन्दी भाषा और साहित्य की अवनति का काल कहा जाये तो सम्भवत: अतिरेक नहीं होगा। आज हिन्दी समाज अन्तर्कलह, आरोप-प्रत्यारोप, वाद-विवाद और वैचारिक शून्यता के अन्धेरे में भटक रहा है। पिछले कुछ दशकों से यही स्थिति बनी हुई है। इससे किसको कितना लाभ मिला यह कहना कठिन है लेकिन जिसको सबसे अधिक हानि हुई है वह स्वयं हिन्दी भाषा और साहित्य है। इसी स्थिति को संदर्भ में रखते हुये मेरे मन में यह विचार आया कि सर्वेक्षण के माध्यम से लोगों की मनोदशा और विचारों को जाना और समझा जा सकता है। मीडिया और प्रबंध जैसे क्षेत्रों में सर्वेक्षण एक सक्षम और सहज मान्य प्रक्रिया है निष्कर्षों तक पहुंचने का लेकिन हिन्दी जगत में इसका प्रयोग मेरी दृष्टि में अभी तक नहीं आया। यह जान लेना आवश्यक है कि किसी सर्वेक्षण के आधार पर निकाले गये निष्कर्ष को पूर्ण प्रमाणिक नहीं कहा जा सकता लेकिन वह(निष्कर्ष) प्रमाणिकता की ओर संकेत अवश्य करता है। साथ ही किसी सर्वेक्षण का परिणाम इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह सर्वेक्षण किस समूह के बीच, किस समय और किस परिस्थिति में किया जा रहा है।
अस्तु, इस बार के सर्वेक्षण का विषय है - हिन्दी भाषा एवं साहित्य - संकट और संभावना । आपकी भागीदारी की अपेक्षा है। आप अपने मित्रों-परिचितों को भी इसमें भाग लेने के लिये प्रेरित कर सकते हैं।
सर्वेक्षण में भाग लेते समय निम्न बातों पर ध्यान दें -
१. यह आपकी स्वेच्छा है।
२. यह विचारों के विनिमय का मंच है हार-जीत का नहीं।
३. पूर्वाग्रहों, वैचारिक दृढता और अतिशयता से बचें ।
४. आप अपने उत्तर अगर सार्वजनिक रूप से प्रगट नहीं करना चाहें तो मुझे मेरे निजी ई-मेल पर भेज सकते है - amarendrak03@yahoo.com (कृपया ध्याद दें - 3 से पहले "शून्य" है)
5. इसका संदर्भ सार्वजनिक, सार्वदेशिक और सार्वकालिक है।
६. प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर सम्भव हैं और अंतिम विकल्प के रूप अपने विचार ५०-१०० शब्दों में प्रगट कर सकते हैं।


प्रश्न १ . आपकी दृष्टि में हिन्दी जगत का सबसे बडा संकट क्या है ?

क) हिंदी साहित्य की गिरती हुई स्तरीयता और लोकप्रियता
ख) हिंदी प्रकाशकों की सार्थक भूमिका का अभाव
ग) सूचना, प्रसारण और मनोरंजन के अन्य माध्यमों का वर्चस्व
घ) सरकार और संगठनों की सार्थक भूमिका का अभाव
ड) स्वतंत्र हिन्दी लेखकों की आर्थिक निर्भरता
च) वैचारिक गुटबंदियां और साहित्यिक असहिष्णुता
छ) सार्थक आलोचना का अभाव
ज) अन्य (अपने विचार ५०-१०० शब्दों में प्रगट करें)

प्रश्न २ . आपकी दृष्टि में हिन्दी जगत की सबसे बडी सम्भावना क्या है ?
क) हिंदी भाषा और साहित्य का भारत की संस्कृति से अन्योनाश्रय सम्बंध
ख) हिंदी लेखकों का अदम्य उत्साह
ग) सूचना और प्रसारण प्रौद्योगिकि का विकास
घ) हिन्दी फ़िल्मों की बढती लोकप्रियता
ड) हिन्दी का वैश्विक प्रसार और प्रवासी साहित्य
च) अन्य (अपने विचार ५०-१०० शब्दों में प्रगट करें)