भीड़
(१)
भीड़ में नहीं होती कविता
भीड़ में होता है कोलाहल
कविता अमृत है नहीं हलाहल
अमृत अकेला ही होता है
मात्र विष इकठ्ठे होते हैं ।
(२)
कवियों की भीड़
लेखकों की भीड़
आलोचकों की भीड़
पुरस्कारों की भीड़
पत्रिकाओं की भीड़
संस्थाओं की भीड़
नेताओं की भीड़
स्वयंसेवकों की भीड़
संतों की भीड़
मठों की भीड़
ज्ञानियों की भीड़
मूर्खों की भीड़
भूखों की भीड़
अघायों की भीड़
कारों की भीड़
बजारों की भीड़
चिमनियों की भीड़
धुओं की भीड़
पेड़ काटने वालों की भीड़
पेड़ लगाने वालों की भीड़
हिंसकों की भीड़
अहिंसकों की भीड़
धरती दब रही है
गगन ढक रहा है
शरीर बढ रहा है
आत्मा दब रही है
समाज बंट रहा है
सरोकार घट रहा है
सब कुछ लौट आयेगा
मन की शांति
आत्मा का आलोक
आसमान को वायु
धरती की आयु
पेड़ को फूल-फल
सूखे घाटों का जल
अगर जो कम हो जाये
ये चतुर्दिक भीड़
(३)
मैं जीवन भर
दौड़ता रहा
जब से इस धरती पर आया
स्कूल की पढाई में
खेल-कूद में
गीत-संगीत में
बाद के दिनों में
कालेज में
नौकरी में भी
परिवार के पीछे
पड़ोसियों के आगे
देश और सीमा से परे
मैं दौड़ता गया
मैं दौड़ता गया
भीड़ में खो गया
पर एक दिन
मैं रुक गया
लोगों ने मुड़ कर देखा
दौड़ने वालों ने
ठहरे हुए लोगों ने
यहां तक जिन्होंने
दौड़ना शुरु भी नहीं किया था
सबने मुझसे कहा
भीड़ में पिछड़ जाओगे
एक जगह हो जड़ जाओगे
यहां तक कि सड़ जाओगे
लेकिन मैं जो रुका तो हिला नहीं
लोग मुझे देखते, ठहरते
कुछ सोचते फिर आगे बढ जाते
कुछ समय के बाद
वे लोग मुझे फिर मिले
जो मुझे छोड़ आगे बढे
क्योंकि दुनिया गोल है
वे कहने लगे कि
तू अभी भी यहीं पड़ा है
कब से सड़ रहा है।
मैं मुस्कराया
कुछ हंसे, कुछ रोये
लेकिन मैं जानता था
कि भाग वे रहे थे
मैं नहीं ।
Wednesday, July 21, 2010
Wednesday, June 9, 2010
एक दिन सुबह
अपनी नौकरी से रिटायर होने के बाद एक एकदम नये और अंजाने शहर में बसने का फैसला मेरा ही था। फैसलों में किसी की राय लेना और फैसला में उन राय-मशवरों की भूमिका में बहुत फर्क होता है। मैं नहीं चाहता था कि मेरी नौकरी और नौकरी से जुड़ी चीजे मुझे बाद के जीवन में दूर तक पीछा करे। यह खासकर बहुत सहज होता है उन नौकरियों में जिस तरह की नौकरी में मैं था। भारतीय प्रशासनिक सेवा में बहाली से लेकर, पचासों शहरों में सैकड़ों पदों पर काम करते हुए दिल्ली में सचिव बनने और फिर रिटायर होने के पहले के कुछ अंतिम दिनों तक जिस भूल-भूलैया से गुजरता हुआ मेरा जीवन बीता था उसे बाद में मैं बदले हुए रूप में बिताना चाहता था। बहुत लोग मेरे ही बैच के जो साथ में रिटायर हुए थे उनकी योजनायें आपस में मिलती थीं। उनमें से ज़्यादातर लोग मेट्रोपॉलटिन शहरों में बस गये, दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता आदि। कुछ अपने विदेश में रह रहे अपने बच्चों के पास चले गये। कुछ जो दक्षिण भारत से आये थे उन्होंने अपने क्षेत्र में लौटने का फैसला लिया था। आज कभी जब सोचता हँप तो लगता है कि रिटायर होने के पहले के कुछ दिनों और अपनी मसूरी में हुई ट्रेनिंग में कितना फर्क था। हालाँकि बहुत लोगों में वही ललक थी- नये सिरे से सब कुछ शुरू करने की। लेकिन, ज़्यादातर लोगों जिनसे मैं बाद के दिनों में भी सम्पर्क में रहा वे और उनके निर्णय किन्हीं और शर्तों पर आधारिँत थे। मेरे लिये भी मेरा यह फैसला इतना सहज न होता अगर संरचना, मेरी पत्नी, विदेश में मेरे बसे बच्चों के साथ रहने की इच्छा के बाद भी मेरे फैसले में मेरे साथ न रहती।
अंजाने शहरों में रहना मेरी आदत बन चुकी थी। पहले पढ़ने के लिये शहर-शहर मैं भटका उसके बाद नौकरी मिलने के बाद तो शहर बदलना जैसे नियति बन गया था। अलग-अलग शहर की अपनी एक पहचान होती है। पूरा शहर जैसे एक खास किस्म के राग या लय में बंधा-सा लगता है- एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक ही डोर से बंधा हुआ। प्रशासक होने के नाते आम लोगों के बीच में जाना अक्सर होता था लेकिन उनके जीवन में पैठ उतनी हो नहीं पाती थी कुछ प्रशासकीय व्यवधानों के कारण। लेकिन, समाचार पत्रों, प्रेस, मीडिया और स्थानीय नेताओं के जरिये, कभी उनकी समस्याओं तो कभी उनकी माँगों को लेकर शहर का ऐसा ताना-बुना मेरे सामने आता था जिससे मैं पहचान पाता था कि वह शहर किसी अन्य शहर से कितना भिन्न है या कितना समान।
गुड़गाँव के सेक्टर-१४ में एक फ्लैट में मैं और मेरी पत्नी और साथ में एक पुराना नौकर तीन ही लोग रह गये थे। यहाँ हमें आये हुए अभी तीन महीने ही हुए थे। बड़ा लड़का, अनीश और छोटी लडकी, क्षिप्रा मेरे रिटायरमेंट के समय अपनी छुट्टियों में अमेरिका और आस्ट्रेलिया से भारत आये हुए थे। और उन लोगों के रहते हुए ही हमलोग इस फ्लैट में आ गये थे। वे भी मेरी इस बात से सहमत थे कि दिल्ली के पास होने के साथ-साथ गुड़गाँव में रहना दिल्ली में रहने के बजाय सहज होगा। मेरी अंतिम पोस्टिंग दिल्ली में आज से पाँच साल पहले हुई थी। तभी लोगों ने मुझे दिल्ली में बस जाने के सुझाव दिये थे लेकिन मैं अपने उस निर्णय को अंत समय तक टालता रहा। यह नहीं कि दिल्ली में किसी प्रकार की असुविधा होती, लेकिन जैसा कि मैंने पहले बताया कि मैं अपनी नौकरी के दिनों की छाँह अपने रिटायरमेंट के दिनों पर नहीं पड़ने देना चाहता था।
जल्दी ही मुझे महसूस होने लगा कि रिटायरमेंट के बाद के जीवन में एक अजीब-सा खालीपन आ जाता है। खासकर जब कि मेरी नौकरी में पहले इतनी व्यस्ततायें थी कि कई बार दिन-महीने और साल का पता भी नहीं लगता था। ऑफिस के बाहर आम लोगों की भीड़ और भीतर फाईलों, आफ़िसरों, फोन और योजनाओं और उनकी पेचिदगियों के मध्य कभी पता न चला कि नौकरी के पैंतीस वर्ष कैसे बीत गये।
मेरी नींद सुबह जल्दी ही खुल जाती तो देखता कि संरचना पहले से उठ बैठी है। पैरों के जोड़ों में दर्द होने के बाद भी उसे बिस्तर पर ज़्यादा देर तक रहा नहीं जाता। खिड़की के परदे हटाकर देखता तो अंधेरा अभी छँटा भी न होता। मैं उठकर बाहर घर के पीछे के लॉन में चला जाता। सुबह की ठंडी हवा चेहरे पर तैरने लगती तो रात भर एयरकंडीशनर की हवा से शुष्क हुई त्वचा पर जैसे लगता कि कोई मरहम लगा रहा हो। मैं थोड़ी देर वहीं अप्रील की रात के नीचे बैठा रहता। आसमान में तारे छितरे जान पड़ते, बादलों की हस्ती कुछ धब्बों से ज़्यादा नहीं जान पड़ती। कहीं दूर किसी इक्के-दुक्के गाड़ियों के चलने की आवाज या किसी कुत्ते के भौंकने के सिवा सुबह की उस स्तब्ध नीरता में कोई अतिरिक्त हलचल नहीं होती। संरचना पीछे से आकर मेरे बगल में बैठ जाती। हम कितनी देर तक वहाँ बैठे रहते चुप-चाप। हमारी बातचीत के दायरे में अब बच्चों के कुशल-क्षेम के सिवा कुछ और न आ पाता। उनके फोन भी हर दूसरे दिन आ जाया करते थे इसलिये उनके लिये शुरू में होने वाली चिंता भी अब धीरे-धीरे तिरोहित होने लगी थी। ऐसे में बातों का कोई सूत्र हाथ न लगता देख हम में से कोई उठकर टहलने लगता या फिर ऐसी उलझन से ‘साहब चाय बना दूँ क्या?’ मनोहर की पेशकश हमें बचा ले जाती। मनोहर हमारा सबसे पुराना नौकर था जो आज भी हमारे साथ था। साथ से याद आया कि समय की लहरों में साथ की कितनी नौकायें समय से पहले ही तिरोहित हो गयी थीं। उनका हिसाब भी अब सम्भव नहीं था।
बाहर जब सुबह का उजाला फैलने को होता तो मैं तब तक तैयार होकर डायनिंग हॉल की मेज पर चश्मा लगाये अखबार पढ़ने लगता। मनोहर लाकर मेरी छड़ी दे देता तो मुझे लगता सुबह की सैर का समय हो गया है। पीछे से संरचना की कभी खांसने की तो कभी जोड़ों के दर्द की वजह से कराहने जैसी आवाज मेरा देर तक पीछा करती जब मैं अगली मोड़ तक नहीं पहुँच जाता। अप्रील की उस चमकीली सुबह में कंक्रीट की सड़क से उठती गरम धारायें शरीर को कभी-कभी सेंकती हुई-सी लगती। दिल्ली में पंडारा स्थित निवास के पास हरियाली होने के कारण सुबह कभी इतनी गर्मी नहीं लगती थी। लेकिन यहाँ हरियाली का कहीं नामो-निशान न था। हरियाली के नाम पर कुछ झुलसे हुए पेड़ और बाज़ार के पहले गुलमोहर का एक विशालकाय पेड़ ही था। मुझे कई बार लगता था कि गर्मी की तपिश में जहाँ सारे पेड़ मुरझा जाते थे वहीं गुलमोहर का पेड़ खिला-खिला सा रहता था। मैं चलते-चलते एक पल के लिये ठिठक कर गुलमोर के उस ढीठ पेड़ को देखता रहता। उसके हरे पत्ते के झुरमुट के बीच लाल-लाल फूल दल और दिमाग को बड़े सुकन देते थे।
पार्क जैसे-जैसे पास आता, वहाँ टहलने वालों की जानी-पहचानी सूरतें दिखायी देने लगतीं। अभी मेरी किसी से जान-पहचान नहीं थी इसलिये कुछ लोगों से मुस्कुरा भर लेने का ही नाता था। पार्क के गेट पर पहुँचते ही हवा के ठंडे झोंकों का रेला सा उठता। अन्दर पहुँचते ही तापमान में तीव्र गिरावट लक्षित हो जाती। मैं पार्क के दो-तीन चक्कर लगाने के बाद वहीं पास की बेंच पर देर तक बैठा रहता। कई लोग आते-जाते। कुछ दौड़ते थे तो कई लोग तेज़ कदमों से चलते थे पार्क के किनारे बनी पतली सड़क पर। कुछ लोग इतने धीमे टहलते कि लगता कि बस रस्म अदा कर रहे हों। मैं अपना ध्यान उनसे हटाकर अपने लिपटे हुए अखबार को खोल कर पढ़ने लगता। फिर तो मुझे ख्याल भी न रहता कि आस-पास क्या हो रहा है।
उस दिन सुबह मैं रोज की तरह पार्क के तीन चक्कर लगाने के बाद अखबार पढ़ रहा था कि कोई मेरी बेंच पर आकर मेरे बगल में बैठा था। मैंने ध्यान नहीं दिया होता अगर उन्होंने मुझसे अखबार माँगकर पढ़ने का अनुरोध न किया होता। मैं तब तक अखबार एक बार पढ़ने के बाद दोहरा रहा था इसलिये मैंने अपना पूरा अखबार सम्भालने के बाद उन्हें दे दिया। वे बहुत कम समय तक अखबार को देखते रहे, पढ़ने का उपक्रम करते लगे थे मुझे लेकिन मैं तब तक आने-जाने वालों को देखने लगा था। जल्दी ही उन्होंने अखबार को हम दोनों के बीच रखने के बाद कहा कुछ, ऐसा लगता था जैसे अखबार को साक्षी बनाकर वे कुछ कहना चाहते थे।
‘आपको पहले कभी देखा नहीं यहाँ, सेक्टर में आप नये आये हैं क्या?’
मैं मुड़ा था उनकी तरफ और उनका प्रश्नब मेरी चेतना से टकरा भर गया था, ‘माफ कीजियेगा, मैंने सुना नहीं। आपने कुछ पूछा था?‘
वे थोड़ी देर तक मुझे देखते रहे मानो तौल रहे हों कि वह प्रश्ने क्या फिर से पूछना ठीक होगा।
‘आप क्या यहाँ नये आये हैं?’
‘जी हाँ, मैं तीन महीने पहले ही इस सेक्टर में आया।’ मैंने कहा था। वह थोड़े उद्भ्रांत से लगते थे। दाढ़ी खिचड़ी थी और कुर्ता पायजामा पहने हुए थे। उम्र कोई पैंसठ-सत्तर साल रही होगी।
‘इसके पहले आप कहाँ....’ प्रश्ने पूरा करने से पहले उन्हें कुछ याद आ गया या कुछ और सोचने लगे लेकिन वह प्रश्नन देर तक हमारे और उनके बीच झूलता देख मैंने ही पहल की,
‘मैं इसके पहले दिल्ली में था।’ लेकिन वे अखबार के पन्नों को पलटते रहे जैसा अक्सर बातचीत के क्रम में सोचने के दौरान होता है। मैंने ज़ारी रखते हुए कहा, ‘आप तो काफी समय से होंगे इस शहर में?’
‘काफी समय....’ एक प्रश्नन उनके चेहरे पर तैर गया था, वे सोचते रहे लेकिन किसी नतीजे पर पहुँचते नहीं लगे तो मैंने कहा,
‘समय बहुत तेज़ी से गुज़र जाता है। और, हमें कई बार याद रखना मुश्किल हो जाता है कि कोई बात कब हुई थी।’ मैंने एक उच्छवास के साथ कहा।
उनकी आँखों में कुछ चमका था। वे मेरे पास थोड़े और खिसक आये। अखबार वहीं बेंच के किनारे रख छोड़ा था जो रह-रह कर फड़फड़ा उठता था।
‘आपको मैं बताऊँ तो मैं जालंधर का रहने वाला हूँ। यहाँ आये हुई कितने साल हुए मुझे ठीक से याद नहीं।’ फिर थोड़ा रुकते हुए बोले, ‘लेकिन मैंने स्कूल तक की पढ़ाई जालंधर में पूरी की थी। मुझे पढ़ने का बहुत शौक था।’ उनके स्वर में वही ललक थी जो अक्सर बढ़ते बच्चों में पायी जाती है जब उनसे कभी अपने कौशल के बारे में पूछा जाता है।
‘...और मैंने बहुत पढ़ाई भी की। मुझे नहीं पता कि आपने पढ़ाई कितनी की और आप क्या करते हैं लेकिन पढ़ना मेरे लिये ज़रूरत और शौक दोनों ही था।’
वह जब साँस लेने के लिये रुके तो मैंने कहा, ‘जी, अभी-अभी मैं रिटायर हुआ हूँ।’ वे मुझे देखते रहे, हल्की मुस्कान उनके होठों पर उतर आयी थी जो पपड़ायें होठों पर पूरी तरह फैल न सकी। फिर मेरे बोलने से पहले ही बोल उठे,
‘बाद में मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पी.एच.डी की डीग्री हासिल की।’ थोड़ा रुकने के बाद फिर बोलना शुरू किया, ‘उसके बाद मैंने वहीं पढ़ाना भी शुरू कर दिया था। बाद के दिनों में मैने जामिया मिलया इस्लामिया ...’ फिर अचानाक रुक गये, ‘आपने इस यूनिवर्सिटी के बारे में सुना होगा ‘ यह कहने के बाद भी वे मेरी तरफ देखते रहे जैसे प्रतीक्षा मेरे ‘हाँ ‘करने की कर रहे हों।
‘हाँ-हाँ यह तो बहुत ही चर्चित शिक्षा संस्थानों में से एक है।’ मैंने उन्हें आश्वास्त करते हुए कहा।
’वो सब तो ठीक है। लेकिन आज कल सब कुछ बदल रहा है। न तो अब वो पढ़ाने के तरीके रहे, पढ़ाने वाले रहे और न पढ़ने वाले।’ वे अचानक असंतुष्ट-से दीखे। हालाँकि यह उस प्रकार का असंतोष न था जो अक्सर ऑफिस या दोस्तों की महफिल में आम चर्चाओं के बीच उतर आता है। कहीं यह बात उनके दिल में लम्बे से कचोटती रही हो, ऐसा उनकी बातों से लगा। जब वे चुप हो गये तो मैंने कहा,
‘यह आप सही कह रहे हैं। लेकिन इसको इस अर्थ में भी लिया जा सकता है कि सभी कुछ परिवतर्नशील है। जो और जैसा पहले था वो अब नहीं हो सकता और जो अब और जैसा है वह आने वाले कल में भी वैसा नहीं रहेगा।’ मैंने कोई अलग और नयी बात नहीं कही थी और मुझे यह मालूम था लेकिन वे सहमत होते नहीं लगे।
‘खैर, मैं नहीं मानता कि हर बदलाव को हम स्वाभाविक मान लें। कुछ परिवर्तन एक खतरनाक षडयंत्र की तरह आता है या लाया जाता है। यह एक ऐसे धीमे ज़हर की तरह है कि हम मृत्यु की तरफ तो बढ़ते हैं लेकिन उसे हम विकास का नाम देते चलते हैं। क्या विकास सिर्फ समय के गुजरने के स्केल पर ही मापा जाना चाहिये?’ बोलते हुए उनके होठ थोड़े काँपने लगे तो उन्होंने उसे जीभ से तर कर लिया था। यह ऐसा विषय था जिसके बारे में एकदम से अपना मत दे पाना मुझे असम्भव जान पड़ा। मैं उनकी तरफ देखता रहा। मुझे निरूत्तर देख उन्होंने बातों का सिलसिला मोड़ दिया।
‘खैर, तो मैं यह बता रहा था कि मैंने जामिया मीलिया में कुछ वषों तक पढ़ाया। मैं पढ़ाने के साथ-साथ रिसर्च भी करता था। मैंने अपने रिसर्च के आधार पर दो पुस्कें भी लिखीं, ‘लाभ का मनोवैज्ञानिक पक्ष’, ‘व्यक्ति, समाज और स्वार्थ’। इसके अलावा मेरे बहुत से पेपर्स भी प्रकाशित हुए। कभी आप मेरे यहाँ आये तो मैं आपको दिखाऊँगा।’ कहकर वह मुस्कुराने लगे थे जैसे कि हम बचपन में अपने दोस्तों को अपने नायाब खिलौने के बारे में कुछ बता कर तो कुछ छुपा कर उन्हें ललचाना चाहते हैं।
‘लेकिन, मैं विकास के एक पक्ष से सहमत नहीं हूँ। आज जो हमारे समाज में मूल्यों की गिरावट एक परचून की दुकान से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के व्यापार और सौदों में दिखायी देती है वह विकास के एकपक्षीय प्रधानता के कारण ही है। किसी भी तरह सब कुछ भी पा लेने का होड़ ने एक ऐसी दौड़ में आज के व्यक्ति को धकेल दिया है जहाँ वह अगर भीड़ के साथ भाग नहीं सकता तो उसका कुचला जाना निश्चित है। ऐसे ही क्षण मैं उन पुराने मूल्यों की तरफ लौटने लगता हूँ जब कि हर कार्य को करने के पीछे एक बौद्धिक आधार होता था। जहाँ लोगों का कल्याण ही प्रमुख लक्ष्य हुआ करता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है।’ वे रुके तो मैंने घड़ी देखी, समय कुछ ज़्यादा न हुआ था लेकिन धूप तेज़ होने के कारण पार्क में लोग कम पड़ते जा रहे थे।
‘यह आप सही कह रहे हैं और भ्रष्टाचार भी उस लाभ का ही एक रूप है।’ मैंने उनके विचारों से सहमत जतायी तो वे हँसने लगे। कुछ कारणों से यह विषय मेरे अंतःकरण में भी एक लम्बे अंतराल से घुमर रहा था।
‘भ्रष्टाचार तो एक मियादी बुखार की तरह है। यह समाज में एक समय तक रहेगा ही जब तक हम उसकी तहों में जाकर उसे दूर नहीं करते। आपको मालूम होना चाहिये कि इन सबके पीछे आदमी का वही स्वार्थ है जिसे उसका एक स्वाभाविक लक्षण माना जाता है। यह एक सच है कि हर व्यक्ति के अन्दर स्वार्थ है। लेकिन उस पर काबू पाने के बजाय उसके अधीन हो जाना कायरता है और दगाबाजी है उनके लिये जिनसे वह जुड़ा है। क्योंकि यही स्वार्थ निकटतम सम्बंधों को भी ढहा देता है। और दुनिया का कोई कानून और विधि-व्यवस्था इसे दूर नहीं कर सकते। कुछ देशों ने तो भ्रष्टाचार को वैधानिक मान्यता भी दे दी है।’ वह उत्तेजना में एक हाथ को दूसरे पर ठोकते हुए सम्भल कर बैठ गये। उनके चेहरे के हर कोण से प्रसन्नता ऐसे छलक रही थी मानों कोई नया सूत्र हाथ लग गया हो, फिर कहने लगे, ‘लेकिन इससे भी निदान पाना सम्भव नहीं है। इसका एक ही उपाय है आदमी द्वारा अपने विवेक का सही प्रयोग। उसे पता होना चाहिये कि उसकी जरूरत से ज्यादा किसी चीज को पाना उसके और उसके परिवेश जिसका कि वह हिस्सा है उनके हित में नहीं। आपको मालूम नहीं इससे कितने ही भूखे और गरीब देशों का कल्याण हो जायेगा।’ वह बोल रहे थे और मैं सुन रहा था। ‘यह भी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि आदमी के अलावा संसार के किसी भी अन्य प्राणी में संग्रह करने का कोई प्रचलन नहीं है।’
ऐसा नहीं कि मैं सहमत नहीं था उनकी बातों से लेकिन अपने लम्बे समय के प्रशासनिक सेवा के अनुभव के केंद्र में कितनी ही ऐसी बातें मेरे सामने आती थीं जिनका उनके द्वारा की जा रही बातों से गहरा ताल्लुक था इसलिये मैं सुनना चाहता था। बहुत कम लोग होते हैं जो वही कहते हैं जो वे सोचते हैं। उनसे भी कम होते हैं जो वह सब करते हैं जो वे कहते हैं। लेकिन फिर एक प्रकार के विश्वा स में या आस्था में जो सुख है उसे कोरे तर्कों के आधार पर तौला नहीं जा सकता। और शायद वे भी इसी मनोदशा से गुजरे हों या गुजर रहे हों यह मेरा विश्वाधस नहीं तो अनुमान तो ज़रूर था।
वह थोड़ी देर चुप रहे, बन्द अखबार खोल कर देखा, पन्ने पलटते रहे फिर बन्द करके बगल में रख दिया। अब पार्क में इक्के-दुक्के लोग ही रह गये थे। मैंने भी घड़ी देखी और सोचा कि अब जाना चाहिये। मैंने उनकी तरफ देखा तो उनका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया। वे बदहवाश से उठ खड़े हुए। इसके पहले कि मेरी समझ में कुछ आये मैंने देखा दो लोग उन्हें जबरन कंधे से पकड़ कर ले जाने लगे। मैं हडबड़ा कर उठ खड़ा हुआ। मेरी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करूँ, कोई आस-पास भी नहीं दीखा जिनको बुला पाता। मैंने देखा जब वे लोगों द्वारा जबर्दस्ती लगभग घसीटे जा रहे थे तो उनकी आँखें मेरी तरफ थीं पर पिछले एक-आध घंटे में बनी उनमें पहचान कहीं भी न थी। था तो सिर्फ एक ऐसा खालीपन जो विस्मृति के कागारों से रिसता है, निरतर, निःशब्द...
वे नज़रों से ओझल भी न हुए कि किसी ने मेरे कंधे को छुआ था।
‘घबराईये नहीं। आप पहले बैठ जाईये। मैं आपको सब बताता हूँ।’
मेरे पैर काँप रहे थे यह मुझे तब पता चला जब मैं बेंच पर दुबारा आ बैठा। वे पहले से बेंच पर बैठे थे और उनकी हँसी लाख रोकने के बाद भी रुकती नहीं थी। जब वे थोड़े संयत हुए तो कहना शुरू किया, ’दरअसल आप नये हैं यहाँ इसलिये आपको कुछ भी नहीं मालूम। आप अभी जिनसे बात कर रहे थे और जिनको अभी जाते देखा है वे मेरे बड़े भाई साहब हैं।’ उनकी बातों को सुनकर मुझे जाने क्यों थोड़ी राहत मिली। लेकिन साथ में आश्चकर्य भी शायद इसलिये कि जिस तरह वह रह-रहकर हँसने लगते थे।
‘ओह, मैं ये जानता न था।’ मैंने अखबार के पन्नों को सहेजते हुए कहा, ‘लेकिन आपके भाई साहब बातें बहुत ते की कहते हैं।’
उन्होंने मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में एक शरारत भरी चमक आ गयी थी।
‘तो उन्होंने आपको भी वे सारी बातें बता दीं?‘
‘वे सारी बातें, मतलब मैं समझा नहीं ‘ मैं समझ नहीं पा रहा था वे आखिर कहना क्या चाहते थे।
‘तो उन्होंने कहा होगा कि वे जामिया मिलिया में पढ़ाते थे। और उन्होंने दो किताबें लिखी हैं। यही न?’
वे कहकर मुझे देखते रहे मानो कुछ रहस्योद्घाटन होने वाला हो।
‘हाँ, यही नहीं वे आज के समाज और उसकी सोच पर भी गहरी समझ रखते हैं, ऐसा मुझे लगा।’ मैंने अपनी बात पूरी की नहीं थी कि वे ठठाकर हँस पड़े। मैं हैरान कि इसमें इतना हँसने वाली क्या बात हो सकती है। वे कहने लगे,
‘भाई साहब, वे जामिया मिलिया में क्या पढ़ायेंगे उन्होंने कॉलेज तक का मुँह देखा नहीं। दसवीं कर रहे थे तो हमारे पिताजी लाखों का कारोबार छोड़ कर दुनिया से चल बसे। उसके बाद से ही वे कारोबार में जो आये तो निकल न पाये कभी। हाँ, वे हमेशा अफसोस ज़रूर करते रहे कि अगर किस्मत ने धोखा न दिया होता तो वे ज़रूर पढ़-लिख कर समाज को कुछ दे पाते।’ मुझे उनकी ये बातें एक सदमे से कम चौंकाने वाली नहीं लग रही थीं। एक पल के लिये मैं विश्वा स करने की स्थिति में नहीं था जो मैं देख और सुन रहा था लेकिन तब तक मेरे अन्दर पूरी बात जानने की उत्सुकत भी पैँदा हो गयी थी। वे बताते रहे,
‘लेकिन भाई साहब कारोबार में दुगुनी और रात चौगुनी तरक्की करते रहे। मैं भी उनके साथ-साथ था। लेकिन उनके काम करने के तरीके अलग थे। वे कारोबार में फायदे के सिद्धांत को लेकर हम सब से अलग सोच रखते थे और कारोबार में इमानदारी को सबसे ज़्यादा तरीजह देते थे। इसको लेकर कई बार हमारे साथ के व्यापारियों में कहा-सुनी भी हो जाती थी लेकिन वे अडिग रहते थे। समय गुजरता गया, हमारे परिवार बस गये। उनकी कोई संतान नहीं है। मेरे दो लड़के भी जल्दी-जल्दी ही इस कारोबार में हाथ बँटाने लगे थे। लेकिन बाद के समय में भाई साहब और उनमें मतभेद होने लगे।’ कहने के बाद वे रुके थे। बायें-दायें देखा और फिर कुछ सोचते हुए कहने लगे,
‘बाद में मेरे बेटों ने धोखा देकर उनको अपने कारोबार से बेदखल कर दिया।’ उनकी आवाज पहली बार संजीदा होने लगी थी।
‘तब से लेकर आजतक उनको उनके कमरे में एक तरह से कैद कर रखा है हमारे बेटों ने। धीरे-धीरे उनकी समझ-बूझ जाती रही। और उसके बाद से ही वे एक ऐसी दुनिया और ज़िन्दगी के बारे में लोगों को बताते हैं जिसे शायद वे जीना चाहते थे कभी....’ उनकी आवाज नम होने के साथ-साथ भारी भी हो रही थी। मैंने देखा उनकी तरफ जो अब बगल में देख रहे थे, शायद नज़र मिलाने की एक हिचक या कि कुछ न कर पाने का अपराध-बोध। मुझे कुछ कहते नही सूझ रहा था। तभी वही दो लोग जो पहले आये थे वे अब हमारे आगे आकर खड़े हो गये।
वे उठ खड़े हुए और कहते जा रहे थे, ‘देखो मैं उन्हें नहीं लाया। वे खुद निकलकर आये होंगे।’ लेकिन उन दोनों पर उनकी बातों का कोई असर होता नज़र नहीं आ रहा था और वे इस तरह से खड़े थे जैसे मोर्चे पर सिपाही सावधान मुद्रा में खड़े होते हैं। ये उनके चौकीदार या बॉडीगार्ड जो भी रहे हों लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव न था।
’देखिये, आप अभी चलिये हमारे साथ।’ उन दोनों ने एक ही साथ कहा।
उन्होंने मेरी तरफ एक कातर दृष्टि डाली और उनके साथ-साथ जाने लगे।
मैं अखबार लेकर उठ खड़ा हुआ। दिन की धूप सर पर चमक रही थी। मैं देर तक उन तीनों को पार्क के दरवाजे तक जाते देखता रहा और फिर मैं घर के लिये वापस चल पड़ा।
***********
अंजाने शहरों में रहना मेरी आदत बन चुकी थी। पहले पढ़ने के लिये शहर-शहर मैं भटका उसके बाद नौकरी मिलने के बाद तो शहर बदलना जैसे नियति बन गया था। अलग-अलग शहर की अपनी एक पहचान होती है। पूरा शहर जैसे एक खास किस्म के राग या लय में बंधा-सा लगता है- एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक ही डोर से बंधा हुआ। प्रशासक होने के नाते आम लोगों के बीच में जाना अक्सर होता था लेकिन उनके जीवन में पैठ उतनी हो नहीं पाती थी कुछ प्रशासकीय व्यवधानों के कारण। लेकिन, समाचार पत्रों, प्रेस, मीडिया और स्थानीय नेताओं के जरिये, कभी उनकी समस्याओं तो कभी उनकी माँगों को लेकर शहर का ऐसा ताना-बुना मेरे सामने आता था जिससे मैं पहचान पाता था कि वह शहर किसी अन्य शहर से कितना भिन्न है या कितना समान।
गुड़गाँव के सेक्टर-१४ में एक फ्लैट में मैं और मेरी पत्नी और साथ में एक पुराना नौकर तीन ही लोग रह गये थे। यहाँ हमें आये हुए अभी तीन महीने ही हुए थे। बड़ा लड़का, अनीश और छोटी लडकी, क्षिप्रा मेरे रिटायरमेंट के समय अपनी छुट्टियों में अमेरिका और आस्ट्रेलिया से भारत आये हुए थे। और उन लोगों के रहते हुए ही हमलोग इस फ्लैट में आ गये थे। वे भी मेरी इस बात से सहमत थे कि दिल्ली के पास होने के साथ-साथ गुड़गाँव में रहना दिल्ली में रहने के बजाय सहज होगा। मेरी अंतिम पोस्टिंग दिल्ली में आज से पाँच साल पहले हुई थी। तभी लोगों ने मुझे दिल्ली में बस जाने के सुझाव दिये थे लेकिन मैं अपने उस निर्णय को अंत समय तक टालता रहा। यह नहीं कि दिल्ली में किसी प्रकार की असुविधा होती, लेकिन जैसा कि मैंने पहले बताया कि मैं अपनी नौकरी के दिनों की छाँह अपने रिटायरमेंट के दिनों पर नहीं पड़ने देना चाहता था।
जल्दी ही मुझे महसूस होने लगा कि रिटायरमेंट के बाद के जीवन में एक अजीब-सा खालीपन आ जाता है। खासकर जब कि मेरी नौकरी में पहले इतनी व्यस्ततायें थी कि कई बार दिन-महीने और साल का पता भी नहीं लगता था। ऑफिस के बाहर आम लोगों की भीड़ और भीतर फाईलों, आफ़िसरों, फोन और योजनाओं और उनकी पेचिदगियों के मध्य कभी पता न चला कि नौकरी के पैंतीस वर्ष कैसे बीत गये।
मेरी नींद सुबह जल्दी ही खुल जाती तो देखता कि संरचना पहले से उठ बैठी है। पैरों के जोड़ों में दर्द होने के बाद भी उसे बिस्तर पर ज़्यादा देर तक रहा नहीं जाता। खिड़की के परदे हटाकर देखता तो अंधेरा अभी छँटा भी न होता। मैं उठकर बाहर घर के पीछे के लॉन में चला जाता। सुबह की ठंडी हवा चेहरे पर तैरने लगती तो रात भर एयरकंडीशनर की हवा से शुष्क हुई त्वचा पर जैसे लगता कि कोई मरहम लगा रहा हो। मैं थोड़ी देर वहीं अप्रील की रात के नीचे बैठा रहता। आसमान में तारे छितरे जान पड़ते, बादलों की हस्ती कुछ धब्बों से ज़्यादा नहीं जान पड़ती। कहीं दूर किसी इक्के-दुक्के गाड़ियों के चलने की आवाज या किसी कुत्ते के भौंकने के सिवा सुबह की उस स्तब्ध नीरता में कोई अतिरिक्त हलचल नहीं होती। संरचना पीछे से आकर मेरे बगल में बैठ जाती। हम कितनी देर तक वहाँ बैठे रहते चुप-चाप। हमारी बातचीत के दायरे में अब बच्चों के कुशल-क्षेम के सिवा कुछ और न आ पाता। उनके फोन भी हर दूसरे दिन आ जाया करते थे इसलिये उनके लिये शुरू में होने वाली चिंता भी अब धीरे-धीरे तिरोहित होने लगी थी। ऐसे में बातों का कोई सूत्र हाथ न लगता देख हम में से कोई उठकर टहलने लगता या फिर ऐसी उलझन से ‘साहब चाय बना दूँ क्या?’ मनोहर की पेशकश हमें बचा ले जाती। मनोहर हमारा सबसे पुराना नौकर था जो आज भी हमारे साथ था। साथ से याद आया कि समय की लहरों में साथ की कितनी नौकायें समय से पहले ही तिरोहित हो गयी थीं। उनका हिसाब भी अब सम्भव नहीं था।
बाहर जब सुबह का उजाला फैलने को होता तो मैं तब तक तैयार होकर डायनिंग हॉल की मेज पर चश्मा लगाये अखबार पढ़ने लगता। मनोहर लाकर मेरी छड़ी दे देता तो मुझे लगता सुबह की सैर का समय हो गया है। पीछे से संरचना की कभी खांसने की तो कभी जोड़ों के दर्द की वजह से कराहने जैसी आवाज मेरा देर तक पीछा करती जब मैं अगली मोड़ तक नहीं पहुँच जाता। अप्रील की उस चमकीली सुबह में कंक्रीट की सड़क से उठती गरम धारायें शरीर को कभी-कभी सेंकती हुई-सी लगती। दिल्ली में पंडारा स्थित निवास के पास हरियाली होने के कारण सुबह कभी इतनी गर्मी नहीं लगती थी। लेकिन यहाँ हरियाली का कहीं नामो-निशान न था। हरियाली के नाम पर कुछ झुलसे हुए पेड़ और बाज़ार के पहले गुलमोहर का एक विशालकाय पेड़ ही था। मुझे कई बार लगता था कि गर्मी की तपिश में जहाँ सारे पेड़ मुरझा जाते थे वहीं गुलमोहर का पेड़ खिला-खिला सा रहता था। मैं चलते-चलते एक पल के लिये ठिठक कर गुलमोर के उस ढीठ पेड़ को देखता रहता। उसके हरे पत्ते के झुरमुट के बीच लाल-लाल फूल दल और दिमाग को बड़े सुकन देते थे।
पार्क जैसे-जैसे पास आता, वहाँ टहलने वालों की जानी-पहचानी सूरतें दिखायी देने लगतीं। अभी मेरी किसी से जान-पहचान नहीं थी इसलिये कुछ लोगों से मुस्कुरा भर लेने का ही नाता था। पार्क के गेट पर पहुँचते ही हवा के ठंडे झोंकों का रेला सा उठता। अन्दर पहुँचते ही तापमान में तीव्र गिरावट लक्षित हो जाती। मैं पार्क के दो-तीन चक्कर लगाने के बाद वहीं पास की बेंच पर देर तक बैठा रहता। कई लोग आते-जाते। कुछ दौड़ते थे तो कई लोग तेज़ कदमों से चलते थे पार्क के किनारे बनी पतली सड़क पर। कुछ लोग इतने धीमे टहलते कि लगता कि बस रस्म अदा कर रहे हों। मैं अपना ध्यान उनसे हटाकर अपने लिपटे हुए अखबार को खोल कर पढ़ने लगता। फिर तो मुझे ख्याल भी न रहता कि आस-पास क्या हो रहा है।
उस दिन सुबह मैं रोज की तरह पार्क के तीन चक्कर लगाने के बाद अखबार पढ़ रहा था कि कोई मेरी बेंच पर आकर मेरे बगल में बैठा था। मैंने ध्यान नहीं दिया होता अगर उन्होंने मुझसे अखबार माँगकर पढ़ने का अनुरोध न किया होता। मैं तब तक अखबार एक बार पढ़ने के बाद दोहरा रहा था इसलिये मैंने अपना पूरा अखबार सम्भालने के बाद उन्हें दे दिया। वे बहुत कम समय तक अखबार को देखते रहे, पढ़ने का उपक्रम करते लगे थे मुझे लेकिन मैं तब तक आने-जाने वालों को देखने लगा था। जल्दी ही उन्होंने अखबार को हम दोनों के बीच रखने के बाद कहा कुछ, ऐसा लगता था जैसे अखबार को साक्षी बनाकर वे कुछ कहना चाहते थे।
‘आपको पहले कभी देखा नहीं यहाँ, सेक्टर में आप नये आये हैं क्या?’
मैं मुड़ा था उनकी तरफ और उनका प्रश्नब मेरी चेतना से टकरा भर गया था, ‘माफ कीजियेगा, मैंने सुना नहीं। आपने कुछ पूछा था?‘
वे थोड़ी देर तक मुझे देखते रहे मानो तौल रहे हों कि वह प्रश्ने क्या फिर से पूछना ठीक होगा।
‘आप क्या यहाँ नये आये हैं?’
‘जी हाँ, मैं तीन महीने पहले ही इस सेक्टर में आया।’ मैंने कहा था। वह थोड़े उद्भ्रांत से लगते थे। दाढ़ी खिचड़ी थी और कुर्ता पायजामा पहने हुए थे। उम्र कोई पैंसठ-सत्तर साल रही होगी।
‘इसके पहले आप कहाँ....’ प्रश्ने पूरा करने से पहले उन्हें कुछ याद आ गया या कुछ और सोचने लगे लेकिन वह प्रश्नन देर तक हमारे और उनके बीच झूलता देख मैंने ही पहल की,
‘मैं इसके पहले दिल्ली में था।’ लेकिन वे अखबार के पन्नों को पलटते रहे जैसा अक्सर बातचीत के क्रम में सोचने के दौरान होता है। मैंने ज़ारी रखते हुए कहा, ‘आप तो काफी समय से होंगे इस शहर में?’
‘काफी समय....’ एक प्रश्नन उनके चेहरे पर तैर गया था, वे सोचते रहे लेकिन किसी नतीजे पर पहुँचते नहीं लगे तो मैंने कहा,
‘समय बहुत तेज़ी से गुज़र जाता है। और, हमें कई बार याद रखना मुश्किल हो जाता है कि कोई बात कब हुई थी।’ मैंने एक उच्छवास के साथ कहा।
उनकी आँखों में कुछ चमका था। वे मेरे पास थोड़े और खिसक आये। अखबार वहीं बेंच के किनारे रख छोड़ा था जो रह-रह कर फड़फड़ा उठता था।
‘आपको मैं बताऊँ तो मैं जालंधर का रहने वाला हूँ। यहाँ आये हुई कितने साल हुए मुझे ठीक से याद नहीं।’ फिर थोड़ा रुकते हुए बोले, ‘लेकिन मैंने स्कूल तक की पढ़ाई जालंधर में पूरी की थी। मुझे पढ़ने का बहुत शौक था।’ उनके स्वर में वही ललक थी जो अक्सर बढ़ते बच्चों में पायी जाती है जब उनसे कभी अपने कौशल के बारे में पूछा जाता है।
‘...और मैंने बहुत पढ़ाई भी की। मुझे नहीं पता कि आपने पढ़ाई कितनी की और आप क्या करते हैं लेकिन पढ़ना मेरे लिये ज़रूरत और शौक दोनों ही था।’
वह जब साँस लेने के लिये रुके तो मैंने कहा, ‘जी, अभी-अभी मैं रिटायर हुआ हूँ।’ वे मुझे देखते रहे, हल्की मुस्कान उनके होठों पर उतर आयी थी जो पपड़ायें होठों पर पूरी तरह फैल न सकी। फिर मेरे बोलने से पहले ही बोल उठे,
‘बाद में मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पी.एच.डी की डीग्री हासिल की।’ थोड़ा रुकने के बाद फिर बोलना शुरू किया, ‘उसके बाद मैंने वहीं पढ़ाना भी शुरू कर दिया था। बाद के दिनों में मैने जामिया मिलया इस्लामिया ...’ फिर अचानाक रुक गये, ‘आपने इस यूनिवर्सिटी के बारे में सुना होगा ‘ यह कहने के बाद भी वे मेरी तरफ देखते रहे जैसे प्रतीक्षा मेरे ‘हाँ ‘करने की कर रहे हों।
‘हाँ-हाँ यह तो बहुत ही चर्चित शिक्षा संस्थानों में से एक है।’ मैंने उन्हें आश्वास्त करते हुए कहा।
’वो सब तो ठीक है। लेकिन आज कल सब कुछ बदल रहा है। न तो अब वो पढ़ाने के तरीके रहे, पढ़ाने वाले रहे और न पढ़ने वाले।’ वे अचानक असंतुष्ट-से दीखे। हालाँकि यह उस प्रकार का असंतोष न था जो अक्सर ऑफिस या दोस्तों की महफिल में आम चर्चाओं के बीच उतर आता है। कहीं यह बात उनके दिल में लम्बे से कचोटती रही हो, ऐसा उनकी बातों से लगा। जब वे चुप हो गये तो मैंने कहा,
‘यह आप सही कह रहे हैं। लेकिन इसको इस अर्थ में भी लिया जा सकता है कि सभी कुछ परिवतर्नशील है। जो और जैसा पहले था वो अब नहीं हो सकता और जो अब और जैसा है वह आने वाले कल में भी वैसा नहीं रहेगा।’ मैंने कोई अलग और नयी बात नहीं कही थी और मुझे यह मालूम था लेकिन वे सहमत होते नहीं लगे।
‘खैर, मैं नहीं मानता कि हर बदलाव को हम स्वाभाविक मान लें। कुछ परिवर्तन एक खतरनाक षडयंत्र की तरह आता है या लाया जाता है। यह एक ऐसे धीमे ज़हर की तरह है कि हम मृत्यु की तरफ तो बढ़ते हैं लेकिन उसे हम विकास का नाम देते चलते हैं। क्या विकास सिर्फ समय के गुजरने के स्केल पर ही मापा जाना चाहिये?’ बोलते हुए उनके होठ थोड़े काँपने लगे तो उन्होंने उसे जीभ से तर कर लिया था। यह ऐसा विषय था जिसके बारे में एकदम से अपना मत दे पाना मुझे असम्भव जान पड़ा। मैं उनकी तरफ देखता रहा। मुझे निरूत्तर देख उन्होंने बातों का सिलसिला मोड़ दिया।
‘खैर, तो मैं यह बता रहा था कि मैंने जामिया मीलिया में कुछ वषों तक पढ़ाया। मैं पढ़ाने के साथ-साथ रिसर्च भी करता था। मैंने अपने रिसर्च के आधार पर दो पुस्कें भी लिखीं, ‘लाभ का मनोवैज्ञानिक पक्ष’, ‘व्यक्ति, समाज और स्वार्थ’। इसके अलावा मेरे बहुत से पेपर्स भी प्रकाशित हुए। कभी आप मेरे यहाँ आये तो मैं आपको दिखाऊँगा।’ कहकर वह मुस्कुराने लगे थे जैसे कि हम बचपन में अपने दोस्तों को अपने नायाब खिलौने के बारे में कुछ बता कर तो कुछ छुपा कर उन्हें ललचाना चाहते हैं।
‘लेकिन, मैं विकास के एक पक्ष से सहमत नहीं हूँ। आज जो हमारे समाज में मूल्यों की गिरावट एक परचून की दुकान से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के व्यापार और सौदों में दिखायी देती है वह विकास के एकपक्षीय प्रधानता के कारण ही है। किसी भी तरह सब कुछ भी पा लेने का होड़ ने एक ऐसी दौड़ में आज के व्यक्ति को धकेल दिया है जहाँ वह अगर भीड़ के साथ भाग नहीं सकता तो उसका कुचला जाना निश्चित है। ऐसे ही क्षण मैं उन पुराने मूल्यों की तरफ लौटने लगता हूँ जब कि हर कार्य को करने के पीछे एक बौद्धिक आधार होता था। जहाँ लोगों का कल्याण ही प्रमुख लक्ष्य हुआ करता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है।’ वे रुके तो मैंने घड़ी देखी, समय कुछ ज़्यादा न हुआ था लेकिन धूप तेज़ होने के कारण पार्क में लोग कम पड़ते जा रहे थे।
‘यह आप सही कह रहे हैं और भ्रष्टाचार भी उस लाभ का ही एक रूप है।’ मैंने उनके विचारों से सहमत जतायी तो वे हँसने लगे। कुछ कारणों से यह विषय मेरे अंतःकरण में भी एक लम्बे अंतराल से घुमर रहा था।
‘भ्रष्टाचार तो एक मियादी बुखार की तरह है। यह समाज में एक समय तक रहेगा ही जब तक हम उसकी तहों में जाकर उसे दूर नहीं करते। आपको मालूम होना चाहिये कि इन सबके पीछे आदमी का वही स्वार्थ है जिसे उसका एक स्वाभाविक लक्षण माना जाता है। यह एक सच है कि हर व्यक्ति के अन्दर स्वार्थ है। लेकिन उस पर काबू पाने के बजाय उसके अधीन हो जाना कायरता है और दगाबाजी है उनके लिये जिनसे वह जुड़ा है। क्योंकि यही स्वार्थ निकटतम सम्बंधों को भी ढहा देता है। और दुनिया का कोई कानून और विधि-व्यवस्था इसे दूर नहीं कर सकते। कुछ देशों ने तो भ्रष्टाचार को वैधानिक मान्यता भी दे दी है।’ वह उत्तेजना में एक हाथ को दूसरे पर ठोकते हुए सम्भल कर बैठ गये। उनके चेहरे के हर कोण से प्रसन्नता ऐसे छलक रही थी मानों कोई नया सूत्र हाथ लग गया हो, फिर कहने लगे, ‘लेकिन इससे भी निदान पाना सम्भव नहीं है। इसका एक ही उपाय है आदमी द्वारा अपने विवेक का सही प्रयोग। उसे पता होना चाहिये कि उसकी जरूरत से ज्यादा किसी चीज को पाना उसके और उसके परिवेश जिसका कि वह हिस्सा है उनके हित में नहीं। आपको मालूम नहीं इससे कितने ही भूखे और गरीब देशों का कल्याण हो जायेगा।’ वह बोल रहे थे और मैं सुन रहा था। ‘यह भी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि आदमी के अलावा संसार के किसी भी अन्य प्राणी में संग्रह करने का कोई प्रचलन नहीं है।’
ऐसा नहीं कि मैं सहमत नहीं था उनकी बातों से लेकिन अपने लम्बे समय के प्रशासनिक सेवा के अनुभव के केंद्र में कितनी ही ऐसी बातें मेरे सामने आती थीं जिनका उनके द्वारा की जा रही बातों से गहरा ताल्लुक था इसलिये मैं सुनना चाहता था। बहुत कम लोग होते हैं जो वही कहते हैं जो वे सोचते हैं। उनसे भी कम होते हैं जो वह सब करते हैं जो वे कहते हैं। लेकिन फिर एक प्रकार के विश्वा स में या आस्था में जो सुख है उसे कोरे तर्कों के आधार पर तौला नहीं जा सकता। और शायद वे भी इसी मनोदशा से गुजरे हों या गुजर रहे हों यह मेरा विश्वाधस नहीं तो अनुमान तो ज़रूर था।
वह थोड़ी देर चुप रहे, बन्द अखबार खोल कर देखा, पन्ने पलटते रहे फिर बन्द करके बगल में रख दिया। अब पार्क में इक्के-दुक्के लोग ही रह गये थे। मैंने भी घड़ी देखी और सोचा कि अब जाना चाहिये। मैंने उनकी तरफ देखा तो उनका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया। वे बदहवाश से उठ खड़े हुए। इसके पहले कि मेरी समझ में कुछ आये मैंने देखा दो लोग उन्हें जबरन कंधे से पकड़ कर ले जाने लगे। मैं हडबड़ा कर उठ खड़ा हुआ। मेरी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करूँ, कोई आस-पास भी नहीं दीखा जिनको बुला पाता। मैंने देखा जब वे लोगों द्वारा जबर्दस्ती लगभग घसीटे जा रहे थे तो उनकी आँखें मेरी तरफ थीं पर पिछले एक-आध घंटे में बनी उनमें पहचान कहीं भी न थी। था तो सिर्फ एक ऐसा खालीपन जो विस्मृति के कागारों से रिसता है, निरतर, निःशब्द...
वे नज़रों से ओझल भी न हुए कि किसी ने मेरे कंधे को छुआ था।
‘घबराईये नहीं। आप पहले बैठ जाईये। मैं आपको सब बताता हूँ।’
मेरे पैर काँप रहे थे यह मुझे तब पता चला जब मैं बेंच पर दुबारा आ बैठा। वे पहले से बेंच पर बैठे थे और उनकी हँसी लाख रोकने के बाद भी रुकती नहीं थी। जब वे थोड़े संयत हुए तो कहना शुरू किया, ’दरअसल आप नये हैं यहाँ इसलिये आपको कुछ भी नहीं मालूम। आप अभी जिनसे बात कर रहे थे और जिनको अभी जाते देखा है वे मेरे बड़े भाई साहब हैं।’ उनकी बातों को सुनकर मुझे जाने क्यों थोड़ी राहत मिली। लेकिन साथ में आश्चकर्य भी शायद इसलिये कि जिस तरह वह रह-रहकर हँसने लगते थे।
‘ओह, मैं ये जानता न था।’ मैंने अखबार के पन्नों को सहेजते हुए कहा, ‘लेकिन आपके भाई साहब बातें बहुत ते की कहते हैं।’
उन्होंने मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में एक शरारत भरी चमक आ गयी थी।
‘तो उन्होंने आपको भी वे सारी बातें बता दीं?‘
‘वे सारी बातें, मतलब मैं समझा नहीं ‘ मैं समझ नहीं पा रहा था वे आखिर कहना क्या चाहते थे।
‘तो उन्होंने कहा होगा कि वे जामिया मिलिया में पढ़ाते थे। और उन्होंने दो किताबें लिखी हैं। यही न?’
वे कहकर मुझे देखते रहे मानो कुछ रहस्योद्घाटन होने वाला हो।
‘हाँ, यही नहीं वे आज के समाज और उसकी सोच पर भी गहरी समझ रखते हैं, ऐसा मुझे लगा।’ मैंने अपनी बात पूरी की नहीं थी कि वे ठठाकर हँस पड़े। मैं हैरान कि इसमें इतना हँसने वाली क्या बात हो सकती है। वे कहने लगे,
‘भाई साहब, वे जामिया मिलिया में क्या पढ़ायेंगे उन्होंने कॉलेज तक का मुँह देखा नहीं। दसवीं कर रहे थे तो हमारे पिताजी लाखों का कारोबार छोड़ कर दुनिया से चल बसे। उसके बाद से ही वे कारोबार में जो आये तो निकल न पाये कभी। हाँ, वे हमेशा अफसोस ज़रूर करते रहे कि अगर किस्मत ने धोखा न दिया होता तो वे ज़रूर पढ़-लिख कर समाज को कुछ दे पाते।’ मुझे उनकी ये बातें एक सदमे से कम चौंकाने वाली नहीं लग रही थीं। एक पल के लिये मैं विश्वा स करने की स्थिति में नहीं था जो मैं देख और सुन रहा था लेकिन तब तक मेरे अन्दर पूरी बात जानने की उत्सुकत भी पैँदा हो गयी थी। वे बताते रहे,
‘लेकिन भाई साहब कारोबार में दुगुनी और रात चौगुनी तरक्की करते रहे। मैं भी उनके साथ-साथ था। लेकिन उनके काम करने के तरीके अलग थे। वे कारोबार में फायदे के सिद्धांत को लेकर हम सब से अलग सोच रखते थे और कारोबार में इमानदारी को सबसे ज़्यादा तरीजह देते थे। इसको लेकर कई बार हमारे साथ के व्यापारियों में कहा-सुनी भी हो जाती थी लेकिन वे अडिग रहते थे। समय गुजरता गया, हमारे परिवार बस गये। उनकी कोई संतान नहीं है। मेरे दो लड़के भी जल्दी-जल्दी ही इस कारोबार में हाथ बँटाने लगे थे। लेकिन बाद के समय में भाई साहब और उनमें मतभेद होने लगे।’ कहने के बाद वे रुके थे। बायें-दायें देखा और फिर कुछ सोचते हुए कहने लगे,
‘बाद में मेरे बेटों ने धोखा देकर उनको अपने कारोबार से बेदखल कर दिया।’ उनकी आवाज पहली बार संजीदा होने लगी थी।
‘तब से लेकर आजतक उनको उनके कमरे में एक तरह से कैद कर रखा है हमारे बेटों ने। धीरे-धीरे उनकी समझ-बूझ जाती रही। और उसके बाद से ही वे एक ऐसी दुनिया और ज़िन्दगी के बारे में लोगों को बताते हैं जिसे शायद वे जीना चाहते थे कभी....’ उनकी आवाज नम होने के साथ-साथ भारी भी हो रही थी। मैंने देखा उनकी तरफ जो अब बगल में देख रहे थे, शायद नज़र मिलाने की एक हिचक या कि कुछ न कर पाने का अपराध-बोध। मुझे कुछ कहते नही सूझ रहा था। तभी वही दो लोग जो पहले आये थे वे अब हमारे आगे आकर खड़े हो गये।
वे उठ खड़े हुए और कहते जा रहे थे, ‘देखो मैं उन्हें नहीं लाया। वे खुद निकलकर आये होंगे।’ लेकिन उन दोनों पर उनकी बातों का कोई असर होता नज़र नहीं आ रहा था और वे इस तरह से खड़े थे जैसे मोर्चे पर सिपाही सावधान मुद्रा में खड़े होते हैं। ये उनके चौकीदार या बॉडीगार्ड जो भी रहे हों लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव न था।
’देखिये, आप अभी चलिये हमारे साथ।’ उन दोनों ने एक ही साथ कहा।
उन्होंने मेरी तरफ एक कातर दृष्टि डाली और उनके साथ-साथ जाने लगे।
मैं अखबार लेकर उठ खड़ा हुआ। दिन की धूप सर पर चमक रही थी। मैं देर तक उन तीनों को पार्क के दरवाजे तक जाते देखता रहा और फिर मैं घर के लिये वापस चल पड़ा।
***********
Friday, April 2, 2010
निर्मल वर्मा जयंती

३ अप्रैल १९२९ को निर्मल वर्मा का जन्म हुआ था। निर्मल वर्मा उन चुने हुए साहित्यकारों में थे जिनकी कृतियों को बार-बार पढ़ा जायेगा। उनकी कृतियों की तुलना श्रीरामचरितमानस या श्रीमद्भागवतगीता से तो नहीं करूंगा लेकिन कला की दृष्टि से मैं उनकी रचनाओं की ओर बार-बार आकृष्ट होता रहा हूं। इस अर्थ में वे मेरे कुछ चुने हुए रचनाकारों में से एक हैं।
प्रेमचंद और उनके परवर्ती साहित्यकारों जैसे भगवतीचरण वर्मा, फणीश्वरनाथ "रेणु" आदि के बाद साहित्यिक परिदृश्य एकदम से बदल गया। खासकर साठ-सत्तर के दशक के दौरान और उसके बाद बहुत कम लेखक हुए जिन्हें कला की दृष्टि से हिन्दी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान के लिये याद किया जायेगा। संख्या में गुणवत्ता के सापेक्ष आनुपातिक वृद्धि ही हुई । इसके कारणों में ये प्रमुख रहे - हिन्दी का सरकारीकरण, नये वादों-विवादों का उदय, उपभोक्तावाद का वर्चस्व आदि। उनके जैसे साहित्यकार से उनके समकालीन और बाद के साहित्यकार जितना कुछ सीख सकते थे और अपने योगदान में अभिवृद्धि कर सकते थे उतना वे नहीं कर पाये। उन्हें जितना मान दिया गया उतना ही उनका अनदेखा भी हुआ । जितनी चर्चा उनकी कृतियों पर होनी चाहिये थी शायद वह हुई ही नहीं। वे उन चुने हुए व्यक्तियों में थे जिन्होंने साहित्य और कला की निष्काम साधना की और जीवनपर्यन्त अपने मूल्यों का निर्वाह किया। एक तरह से वे अपने समय के एक अकेले "स्कूल" थे।
हालांकि वे नयी कहानी के जनक के रूप में जाने जाते हैं पर मेरे विचार में वे कहानीकार से बढ़कर चिंतक और दार्शनिक थे। समय, समाज, साहित्य, अध्यात्म और दर्शन पर उनकी समझ और पकड़ पिछली कई सदियों के साहित्यिक मनीषियों से अधिक गहरी थी। "ढलान से उतरते हुये", "पिछली शताब्दी के ढलते वर्षों में", "कला का जोखिम", "शब्द और स्मृति", "भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र" जैसी पुस्तकें और उनमें संग्रहीत उनके निबंध इसके प्रमाण हैं।
उनकी कहानियों की यात्रा "परिंदे" से शुरु होकर "पिछली गर्मियों" की "जलती झाड़ी" से होती "बीच बहस में" ठहरती हुई "सूखा" के बाद " कव्वे और काला पानी" तक पहुंची तो ऐसा लगा हिन्दी साहित्य को प्रेमचंद का उत्तराधिकारी मिल गया हो। यह प्रचलित अर्थों में नहीं, बल्कि इस अर्थ में कि प्रेमचंद के बाद कहानी की यात्रा को निर्मल वर्मा की कहानियों के नवीन धरातल, उत्तम शिल्प और गहन/ सघन शैली से ही संवर्धित किया जा सकता था । प्रेमचंद की कहानियों का फैलाव और निर्मल वर्मा की कहानियों की कलात्मक गहराई एक दूसरे के पूरक सिद्ध होते हैं। निर्मल वर्मा साहित्यिक कला के ऐसे शिखर पर नज़र आते हैं जिसके पार ढलान ही ढलान दिखायी देती है।
Sunday, March 28, 2010
कला और युगबोध
आहत विश्व के प्रतिपल रुदन में
खींची मुस्कान की रेखा सस्मित ।
जग की व्यथा, निज के संतप्त मन में
नव चेतना ले कला हुई अवतरित ।
सृष्टि का चक्र जब से है चला
युग बदले और जग भी है बदला ।
मनुज कई बार गिरा, गिरकर सम्भला
गुफा से निकल अब अंतरिक्ष को निकला।
उंचे आदर्शों के उतंग शिखरों से
कवि, निकले तेरी ऐसी कविता धारा ।
फोड़ कर संकुचित वृत्ति के पाषाणों को
बहा ले जाये जो कलुषित विचार सारा ।
व्यक्त करना क्या उन्हें जो स्वयं मूर्त है
व्यक्त करो उन्हें जो सदा से अमूर्त है ।
रोको न उन्हें जो जीवन पथ में आगे बढ़े
जगाओ जिनकी चेतना अब तक सुप्त है।
दंगा, क्रू्रता और उत्पीड़न के पृष्ठों पर
चित्रकार, डालो प्रेम और स्नेह के रंग ।
तूलिका तेरी बन जाये अजेय शस्त्र
जीतो पशुता को मनुजता के संग संग ।
हो चुका रोना बहुत व्यतिक्रमों का
संगीतज्ञ, उठाओ तुम अब सितार ।
रहे न लालसा फिर जग में कुछ पाने का
सुनके जिस दिव्य राग को एक बार ।
ले कोमल भावों की मिट्टी, सरल सी कल्पना
मूर्तिकार, बना सौंदर्य की ऐसी कोई प्रतिमा ।
"गति ही जीवन है" बस असत्य हो जाये
भर दे उसमें चपला सी सजीव चपलता ।
२५ मई, १९९५
खींची मुस्कान की रेखा सस्मित ।
जग की व्यथा, निज के संतप्त मन में
नव चेतना ले कला हुई अवतरित ।
सृष्टि का चक्र जब से है चला
युग बदले और जग भी है बदला ।
मनुज कई बार गिरा, गिरकर सम्भला
गुफा से निकल अब अंतरिक्ष को निकला।
उंचे आदर्शों के उतंग शिखरों से
कवि, निकले तेरी ऐसी कविता धारा ।
फोड़ कर संकुचित वृत्ति के पाषाणों को
बहा ले जाये जो कलुषित विचार सारा ।
व्यक्त करना क्या उन्हें जो स्वयं मूर्त है
व्यक्त करो उन्हें जो सदा से अमूर्त है ।
रोको न उन्हें जो जीवन पथ में आगे बढ़े
जगाओ जिनकी चेतना अब तक सुप्त है।
दंगा, क्रू्रता और उत्पीड़न के पृष्ठों पर
चित्रकार, डालो प्रेम और स्नेह के रंग ।
तूलिका तेरी बन जाये अजेय शस्त्र
जीतो पशुता को मनुजता के संग संग ।
हो चुका रोना बहुत व्यतिक्रमों का
संगीतज्ञ, उठाओ तुम अब सितार ।
रहे न लालसा फिर जग में कुछ पाने का
सुनके जिस दिव्य राग को एक बार ।
ले कोमल भावों की मिट्टी, सरल सी कल्पना
मूर्तिकार, बना सौंदर्य की ऐसी कोई प्रतिमा ।
"गति ही जीवन है" बस असत्य हो जाये
भर दे उसमें चपला सी सजीव चपलता ।
२५ मई, १९९५
Sunday, January 31, 2010
कविता का कारखाना
कविता का भी जो अगर कारखाना होता
जहां हर दिन रची जातीं कवितायें
बाजार की मांग को ध्यान में रखकर
कच्चे माल की उपलब्धि,
कवियों का बाहुल्य
और कविता की खपत को नज़र में रखकर ही
खोले जातें कारखानें ।
सरकार से अनुदान में मिली जमीन
या फिर कर में मिली कटौती
बनती आधार किस राज्य या देश में
खोले जायें कारखाने ।
और भूमंडलीकरण के आज के समय में
क्या आर्थिक और सामाजिक असमानता
कविता के उत्पादन और विक्रय के
निर्णयों को प्रभावित नहीं करते ?
की जाती कवियों की नियुक्तियां
उनकी शिक्षा-दीक्षा, व्यक्तित्त्व
और उनके अनुभव के आधार पर ।
कहीं किया जाता अनुसंधान
कि कैसी होनी चाहिये कविता
कैसे उसकी मांग रखी जाये बरकरार
उपभोक्ताओं की अभिरूचि का आधार
कैसे हो कविता का विकास
रूप-रंग-रस और गंध नया
नया छंद और अलंकार नया ।
या फिर बदली जाती लोगों की अभिरूचियां
सिलसिलेवार और सुनिश्चित योजनाओं के तहत ।
रेडियों-दूरदर्शन और सिनेमाघरों में
नयी कविताओं के आते इश्तेहार
सस्ती और टिकाउं
लम्बी और पतली
सुन्दर और निर्दोष
ताजा और मोहक....
बच्चों-किशोरों-युवकों और बजुर्गों
हर उम्र के लोगों को लुभाने के लिये
होती हर तरह की कवितायें
सबके होते अपने विकल्प
हर कविता की अपनी कीमत होती
हर का होता अपना बाज़ार
हर रोज सुबह कवि आते
हाजिरी देने के बाद
कविता की उत्पादन रेखा पर
कल की पड़ी अधूरी कवितायें
पूरी की जातीं पहले
फिर नये लक्ष्य के आधार पर
शुरु होता कविता का उत्पादन
कविता के दोषों का निरीक्षण
और फिर निराकरण किया जाता
बाजार में भेजने से पहले।
कवियों को मिलती हर महीने मजदूरी
नहीं रहती फिर उनकी आर्थिक मजबूरी
नहीं होते प्रकाशकों के फंदे
या आलोचकों के लटके-झटके
उनके बच्चें भी जाते अच्छे स्कूल
घर में होता सुख और शुकून
कविता के कारखाने खोलने
आती बहुराष्ट्रीय कम्पनियां
देश में होता विदेशी निवेश
स्थानीय कवियों को मिलता अन्तर्राष्ट्रीय मंच
नयी शैली, नया कथ्य और शिल्प नया
नये मनोबल, नयी आकांक्षा और संकल्प नया।
कविताओं की होती छोटी-बड़ी दुकानें
खुल जाते बडे-बड़े माल
लोग अपनी-अपनी हसियत से
खरीद पाते अपनी पसंद की कवितायें।
खास मौसम या त्योहारों पर लगती
कविताओं की खास बिक्री (सेल)
कुछ पुरानी कम बिकने वाली कवितायें
निकाल दी जाती सस्ते दामों पर
और कुछ लोग अपनी हैसियत से
कहीं अधिक कीमत वाली
कवितायें खरीद पातें।
तब कुछ खास कविता को रख पाना
सामाजिक प्रतिष्ठा का चिह्न माना जाता।
और कुछ लोग उसे ललचायी दृष्टि से देखते।
आर्थिक मंदी के दिनों
जब कविता की मांग गिर जाती।
पहले बंद होती कुछ कविताओं का उत्पादन
फिर मंदी के और बढ़ जाने पर
बंद किये जाते कारखानें
छंटनी की जाती कवियों की
खर्चे में कटौती की मार
सबसे अधिक झेलती कविता
क्योंकि तब कविता
वह नहीं होती जो आज है।
*****
जहां हर दिन रची जातीं कवितायें
बाजार की मांग को ध्यान में रखकर
कच्चे माल की उपलब्धि,
कवियों का बाहुल्य
और कविता की खपत को नज़र में रखकर ही
खोले जातें कारखानें ।
सरकार से अनुदान में मिली जमीन
या फिर कर में मिली कटौती
बनती आधार किस राज्य या देश में
खोले जायें कारखाने ।
और भूमंडलीकरण के आज के समय में
क्या आर्थिक और सामाजिक असमानता
कविता के उत्पादन और विक्रय के
निर्णयों को प्रभावित नहीं करते ?
की जाती कवियों की नियुक्तियां
उनकी शिक्षा-दीक्षा, व्यक्तित्त्व
और उनके अनुभव के आधार पर ।
कहीं किया जाता अनुसंधान
कि कैसी होनी चाहिये कविता
कैसे उसकी मांग रखी जाये बरकरार
उपभोक्ताओं की अभिरूचि का आधार
कैसे हो कविता का विकास
रूप-रंग-रस और गंध नया
नया छंद और अलंकार नया ।
या फिर बदली जाती लोगों की अभिरूचियां
सिलसिलेवार और सुनिश्चित योजनाओं के तहत ।
रेडियों-दूरदर्शन और सिनेमाघरों में
नयी कविताओं के आते इश्तेहार
सस्ती और टिकाउं
लम्बी और पतली
सुन्दर और निर्दोष
ताजा और मोहक....
बच्चों-किशोरों-युवकों और बजुर्गों
हर उम्र के लोगों को लुभाने के लिये
होती हर तरह की कवितायें
सबके होते अपने विकल्प
हर कविता की अपनी कीमत होती
हर का होता अपना बाज़ार
हर रोज सुबह कवि आते
हाजिरी देने के बाद
कविता की उत्पादन रेखा पर
कल की पड़ी अधूरी कवितायें
पूरी की जातीं पहले
फिर नये लक्ष्य के आधार पर
शुरु होता कविता का उत्पादन
कविता के दोषों का निरीक्षण
और फिर निराकरण किया जाता
बाजार में भेजने से पहले।
कवियों को मिलती हर महीने मजदूरी
नहीं रहती फिर उनकी आर्थिक मजबूरी
नहीं होते प्रकाशकों के फंदे
या आलोचकों के लटके-झटके
उनके बच्चें भी जाते अच्छे स्कूल
घर में होता सुख और शुकून
कविता के कारखाने खोलने
आती बहुराष्ट्रीय कम्पनियां
देश में होता विदेशी निवेश
स्थानीय कवियों को मिलता अन्तर्राष्ट्रीय मंच
नयी शैली, नया कथ्य और शिल्प नया
नये मनोबल, नयी आकांक्षा और संकल्प नया।
कविताओं की होती छोटी-बड़ी दुकानें
खुल जाते बडे-बड़े माल
लोग अपनी-अपनी हसियत से
खरीद पाते अपनी पसंद की कवितायें।
खास मौसम या त्योहारों पर लगती
कविताओं की खास बिक्री (सेल)
कुछ पुरानी कम बिकने वाली कवितायें
निकाल दी जाती सस्ते दामों पर
और कुछ लोग अपनी हैसियत से
कहीं अधिक कीमत वाली
कवितायें खरीद पातें।
तब कुछ खास कविता को रख पाना
सामाजिक प्रतिष्ठा का चिह्न माना जाता।
और कुछ लोग उसे ललचायी दृष्टि से देखते।
आर्थिक मंदी के दिनों
जब कविता की मांग गिर जाती।
पहले बंद होती कुछ कविताओं का उत्पादन
फिर मंदी के और बढ़ जाने पर
बंद किये जाते कारखानें
छंटनी की जाती कवियों की
खर्चे में कटौती की मार
सबसे अधिक झेलती कविता
क्योंकि तब कविता
वह नहीं होती जो आज है।
*****
Sunday, November 15, 2009
क्षितिज - एक प्रयोग
आज से छ: साल पहले जब क्षितिज के सम्पादन और प्रकाशन की शुरुआत हुई थी तब कोई बहुत बड़ी महत्त्वाकांक्षा नहीं थी इसके पीछे। खेल-खेल में शुरु हुई इस लघु पत्रिका ने प्रयोगों, गुणवत्ता और स्तरीयता के नये आयाम स्थापित किये। दो साल के अंदर यह पत्रिका अमेरिका से निकलकर मध्यपूर्व, भारत और यूरोप होते हुए सिंगापुर, आस्ट्रेलिया और जापान तक पहुंची। लोगों ने इसे सराहा, सहयोग दिया और इसके प्रचार-प्रसार में मदद की। एक साल के बाद २००४ में इसका वार्षिकांक प्रिन्ट रूप में प्रकाशित हुआ। एक साथ प्रिन्ट और ईलेक्ट्रानिक रूप में इसका प्रकाशन २००५ के अंत तक कायम रहा। उसके एक साल बाद तक सिर्फ़ ईलेक्ट्रानिक/वेब रूप में इसका प्रकाशन २००६ तक जारी रहा। आज भी यदा-कदा लोगों के पत्र, रचनायें और फोन आते हैं क्षितिज के प्रकाशन के सम्बंध में। बहुत लोगों ने अनुरोध भी किया कि इसका प्रकाशन फिर से प्रारम्भ करें। लेकिन इसको फिर से शुरु नहीं करने के सम्बंध में मुझे बहुत सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह चर्चा एक ऐसे संदर्भ की तरफ हमें ले जाती है जहां हिंदी की लघुपत्रिकाओं का बड़ा संघर्ष, हिन्दी भाषा और उसके लेखक/पाठक/प्रकाशक का वर्तमान और भविष्य शामिल है। यह एक बड़ा विषय है और इस पर आम तौर पर चर्चा चलती रहती है। मेरा मानना है कि हम चर्चा करने और समस्याओं को खड़ी करने में दक्ष हैं। दूसरे शब्दों में अगर कहें तो हम समस्या उन्मूलक नहीं वरन समस्याजीवी हैं। राजनीति के लिये यह प्रवृति समीचीन है। अगर समस्या नहीं हो तो समाधान करने वालों की आवश्यकता ही नहीं होगी। ऐसे में उनका अस्तित्त्व खतरें में पड़ जायेगा। धीरे-धीरे यही प्रवृति भाषा और साहित्य में आ गयी। इसके कारणों की छानबीन मैं इसके विशेषज्ञों पर छोड़ता हूं। कुछ बातें जो मेरी दृष्टि में गुजरी हैं उनमें से प्रमुख हैं -
१. हिंदी में पत्रिकाओं की तादाद आवश्यकता से ज्यादा है।
२. जहां तादाद ज्यादा है गुणवत्ता और स्तरीयता की भारी कमी है।
३. हिंदी पढने और लिखने के प्रति लोगों का रुझान तेजी से गिरा है। लिखने वाले ही आपस में पढ रहे हैं। शुद्ध पाठक वर्ग लगभग लुप्तप्राय हो गया है।
४. लेखन-पठन-पाठन-सम्पादन-प्रकाशन हर जगह अनुशासन की भारी कमी है।
५. पूरी प्रक्रिया भविष्योन्मुखी न होकर अतीत के गुणगान और वर्तमान के रोने में अटकी पड़ी है।
६. नये प्रयोगों और शिल्प का भारी अभाव है।

क्षितिज - कुछ तथ्य
सितम्बर २००३ - क्षितिज का पहला अंक प्रकाशित (पीडीएफ फाईल/द्विमासिक ई-पत्रिका)
अगस्त २००४ - क्षितिज का वार्षिकांक प्रकाशित (प्रिंट और ईलेक्ट्रानिक दोनों रूप में त्रैमासिक पत्रिका उपलब्ध)
अक्तूबर २००४ - क्षितिज इंकार्पोरेटेड का पंजीकरण एक अलाभकारी संस्था के रूप में
जनवरी २००५ - क्षितिज का वेबसाईट प्रकाशित / क्षितिज के सभी अंक वेब पर उपलब्ध
जनवरी २००६ - क्षितिज का सिर्फ ईलेक्ट्रानिक प्रकाशन जारी
दिसम्बर २००६ - क्षितिज का १६ वां और आखिरी अंक प्रकाशित
संस्थापक-सम्पादक - अमरेन्द्र कुमार
कला-सम्पादक - हर्षा प्रिया सिन्हा
क्षितिज - कुछ वैशिष्टय
१. पी.डी.एफ फाईल में सम्भवत: हिंदी की पहली ईलेक्ट्रानिक पत्रिका प्रकाशित (२००३)
२. कला-वीथिका का समावेश / कला (रेखांकन/चित्र) और साहित्य की संतुलित प्रस्तुति
३. सभी उम्र के कलाकारों और लेखकों का समावेश - एक ही अंक में ५ से ७५ वर्ष के लेखक/कलाकार सम्मिलित
४. साहित्य-कला के साथ-साथ विज्ञान-अभियंत्रण-प्रबंध सम्बंधित विषयों पर आलेख सम्मिलित
५. वैश्विक भागीदारी और वितरण (अमेरिका से सिंगापुर-आस्ट्रेलिया तक)
६. क्षितिज के प्रत्येक अंक का एक वरिष्ठ साहित्यकार को समर्पित होना
७. विभिन्न विधाओं और क्षेत्रों में योगदान देने के लिये १२ "क्षितिज सम्मान" का आरम्भ
अगर आप क्षितिज के किसी अंक को देखना-पढना चाहें तो मुझे सम्पर्क कर सकते हैं।
Wednesday, October 7, 2009
हिन्दी ग़ज़ल
(1)
हुस्न के जो ये नज़ारे नहीं होते
हम ये दिल कभी हारे नहीं होते।
चढ जाते जो सबके होठों पर
वो गीत फिर कंवारे नहीं होते।
तमाम नफ़रतों के बलबलों में
इश्क करने वाले सारे नहीं होते।
मात खायी है हमने तो हर्ज़ नहीं
प्यार करने वाले बेचारे नहीं होते।
जो जगमगाते हरदम उंचाई से
सब के सब सितारे नहीं होते।
दीखते दूर से मौजों के पार जो
ठहरे हुए सब किनारे नहीं होते।
इस दिल को यकीन ही था कब
कि लूटने वाले सहारे नहीं होते।
देना था दगा एक रोज आखिर
दोस्त, काश हम तुम्हारे नहीं होते।
(2)
ठोस भी कभी तरल हो जायेगा
मसला यह भी हल हो जायेगा।
फ़ागुन का रंग जो चढा कभी
चैती बैरागी विकल हो जायेगा।
सच एक था और रहेगा एक पर
अमृत तो कभी गरल हो जायेगा।
पहले से जो तुमने की तैयारियां
जीवन का पर्चा सरल हो जायेगा।
पाकर संग फूलों का एक दिन
कांटा भी कोमल हो जायेगा ।
(3)
हादसों का आशियाना आदमी
खुद से हुआ बेगाना आदमी ।
हर हसरत आखिरी थी लेकिन
हसरतों का ही निशाना आदमी।
दो फूल खिल उठे दामन में कभी
कांटों भरा बाग पुराना आदमी ।
चाहे रोते रहे या कि हंसते रहे
छेडता रहा नया तराना आदमी ।
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
बनता रहा अफ़साना आदमी ।
घर बनते रहे हर शहर में लेकिन
बिखरता हुआ पर ठिकाना आदमी।
(4)
नियति एक कुशल व्यापारी है
काम की खूब समझदारी है।
बेचती है खुशियां गिन गिनकर
फिर भी दुनिया गम की मारी है।
मिलते हैं लोग गले सरहद पर
घर में बंटने की पर बीमारी है।
अंधेरा हो घना भले जितना
जुगनू की चमक पर भारी है।
दिखावे का गुलशन है उनका
सच्ची अपने मन की क्यारी है।
(5)
सेवा का वो अवसर चाहते हैं
बदले में कार व घर चाहते हैं।
भले न हो पाय इस्तेमाल धन का
नये साल में नया कर चाहते हैं।
खुद घूमें बुलेट-प्रूफ़ कार में भले
देश हेतु जनता का सर चाहते हैं।
ढह रही सुरक्षा की दीवारे पर
ईंट के जबाब में पत्थर चाहते हैं।
चमक जायेगा एक दिन वतन अपना
चुनावी वादों का असर चाहते हैं ।
उडाना चाहते उंचे आकाश में
परिन्दे पर वे बे-पर चाहते हैं ।
(6)
आज वन से हरापन गया
कि जीवन से नयापन गया।
रिश्तों की बाढ आयी तो
उनका पर अपनापन गया।
घर में बने कमरे इतने
कि आंगन का खुलापन गया।
मिलाकर हिंदी में अंग्रेजी
बोली का पिछ्डापन गया।
प्रसाद की कामायनी गयी
निराला का निरालापन गया।
उंचे समाज में रहने वाले
बच्चों का तोतलापन गया।
भेडियों की बस्ती में आये
हाथी का मतवालापन गया।
(7)
बचपन का निर्मल मन गया
सोच से आज यौवन गया ।
छतें पडी शहर में इतनी कि
सबके सर से गगन गया ।
बहुत पाने के प्रयास में
बचा खुचा भी धन गया ।
सबका अपना-अपना कमरा
साझे का आंगन गया ।
हम हुये धर्मनिर्पेक्ष इतने
आरती गयी, हवन गया।
मेल जोल में वे आगे गये
तेरे मेरे में यह वतन गया।
आंख रह्ते अंधे हुये ही
उसपर मन का नयन गया।
सर्वाधिकार (Copyright) - अमरेन्द्र कुमार
हुस्न के जो ये नज़ारे नहीं होते
हम ये दिल कभी हारे नहीं होते।
चढ जाते जो सबके होठों पर
वो गीत फिर कंवारे नहीं होते।
तमाम नफ़रतों के बलबलों में
इश्क करने वाले सारे नहीं होते।
मात खायी है हमने तो हर्ज़ नहीं
प्यार करने वाले बेचारे नहीं होते।
जो जगमगाते हरदम उंचाई से
सब के सब सितारे नहीं होते।
दीखते दूर से मौजों के पार जो
ठहरे हुए सब किनारे नहीं होते।
इस दिल को यकीन ही था कब
कि लूटने वाले सहारे नहीं होते।
देना था दगा एक रोज आखिर
दोस्त, काश हम तुम्हारे नहीं होते।
(2)
ठोस भी कभी तरल हो जायेगा
मसला यह भी हल हो जायेगा।
फ़ागुन का रंग जो चढा कभी
चैती बैरागी विकल हो जायेगा।
सच एक था और रहेगा एक पर
अमृत तो कभी गरल हो जायेगा।
पहले से जो तुमने की तैयारियां
जीवन का पर्चा सरल हो जायेगा।
पाकर संग फूलों का एक दिन
कांटा भी कोमल हो जायेगा ।
(3)
हादसों का आशियाना आदमी
खुद से हुआ बेगाना आदमी ।
हर हसरत आखिरी थी लेकिन
हसरतों का ही निशाना आदमी।
दो फूल खिल उठे दामन में कभी
कांटों भरा बाग पुराना आदमी ।
चाहे रोते रहे या कि हंसते रहे
छेडता रहा नया तराना आदमी ।
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
बनता रहा अफ़साना आदमी ।
घर बनते रहे हर शहर में लेकिन
बिखरता हुआ पर ठिकाना आदमी।
(4)
नियति एक कुशल व्यापारी है
काम की खूब समझदारी है।
बेचती है खुशियां गिन गिनकर
फिर भी दुनिया गम की मारी है।
मिलते हैं लोग गले सरहद पर
घर में बंटने की पर बीमारी है।
अंधेरा हो घना भले जितना
जुगनू की चमक पर भारी है।
दिखावे का गुलशन है उनका
सच्ची अपने मन की क्यारी है।
(5)
सेवा का वो अवसर चाहते हैं
बदले में कार व घर चाहते हैं।
भले न हो पाय इस्तेमाल धन का
नये साल में नया कर चाहते हैं।
खुद घूमें बुलेट-प्रूफ़ कार में भले
देश हेतु जनता का सर चाहते हैं।
ढह रही सुरक्षा की दीवारे पर
ईंट के जबाब में पत्थर चाहते हैं।
चमक जायेगा एक दिन वतन अपना
चुनावी वादों का असर चाहते हैं ।
उडाना चाहते उंचे आकाश में
परिन्दे पर वे बे-पर चाहते हैं ।
(6)
आज वन से हरापन गया
कि जीवन से नयापन गया।
रिश्तों की बाढ आयी तो
उनका पर अपनापन गया।
घर में बने कमरे इतने
कि आंगन का खुलापन गया।
मिलाकर हिंदी में अंग्रेजी
बोली का पिछ्डापन गया।
प्रसाद की कामायनी गयी
निराला का निरालापन गया।
उंचे समाज में रहने वाले
बच्चों का तोतलापन गया।
भेडियों की बस्ती में आये
हाथी का मतवालापन गया।
(7)
बचपन का निर्मल मन गया
सोच से आज यौवन गया ।
छतें पडी शहर में इतनी कि
सबके सर से गगन गया ।
बहुत पाने के प्रयास में
बचा खुचा भी धन गया ।
सबका अपना-अपना कमरा
साझे का आंगन गया ।
हम हुये धर्मनिर्पेक्ष इतने
आरती गयी, हवन गया।
मेल जोल में वे आगे गये
तेरे मेरे में यह वतन गया।
आंख रह्ते अंधे हुये ही
उसपर मन का नयन गया।
सर्वाधिकार (Copyright) - अमरेन्द्र कुमार
Subscribe to:
Posts (Atom)