Monday, July 23, 2012

सोशल नेट्वर्किंग - भाग २


सोशल नेट्वर्किंग

भाग २

ब्लाग आया तो लोग रातों-रात लेखक, पत्रकार, चिंतक और आलोचक हो गये । बुद्धिजीवी तो पहले से ही थे । कोई भी पीछे नहीं रहा । बुद्धिजीवी (तथाकथित) तो बुद्धिजीवी, मूर्खों (तथाकथित) ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायी । लोगों ने जमकर लिखा, थोड़ा बहुत पढा और प्रसार के हर माध्यम का भरपूर प्रयोग किया । लोग तो लोग बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने भी इसका सहारा लिया । हिन्दी वाले अब किसी चीज में पीछे नहीं रहते वरन हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं । अब ’स्वांत: सुखाय’ तो कुछ होता नहीं । यह तुलसीदास सरीखे लोगों को शोभा देता होगा जो मात्र अपने सुख के लिये लिखते थे । आज के लोग और खासकर लेखक-कवि इतने स्वार्थी नहीं । अब तो ऐसे लोग अगर कुछ लिखते हैं तो स्वयं उसका सुख लूटने से पहले लोगों में लुटा देना चाहते हैं । फ़िर तो जब ई-मेल से सूचित करने के बाद भी लोग ब्लाग पर नहीं जुटते तो फ़िर फोन और अंतत: घर पहुंचकर इत्तला दे देते हैं – भाई (अथवा बहन ), मैंने कुछ अद्भुत लिखा है, पढ लो अन्यथा दोष मत देना कि मित्र (भाई अथवा बहन भी ) होकर छुपा ले गये । अब सामने वाला भी सिर्फ़ पाठक थोड़े ही है, वह आपको अपने कम्प्यूटर पर बिठाकर दस-पन्द्रह पृष्ठों का अपना ताज़ा लेख पढवा देता है । आदान-प्रदान में कोई भी पीछे नहीं । अब हताश-पताश हो जब आप लौटते हैं तभी विचार कर लेते हैं कि अबकी बीस-पच्चीस पृष्ठों का ब्लाग लिखकर उसके ब्लाग पाठ का एह्सान उतार दूंगा । यह क्रम चलता रहता है । समाज, साहित्य और संस्कृति दिन दुना रात-चौगुना मोटे पर मोटे होते जा रहे हैं ।

            फेसबुक से पहले उनके बड़े भाई ’औरकुट’ से मिलते चलते हैं । जब ’औरकुट’ अवतरित हुआ था तो लोगों ने उसे हाथों-हाथ लिया था । जी भरकर ’स्क्रैप’ लिखते और एक दूसरे को पढते-पढवाते । कई बार दूसरों पर ’स्क्रैप’ लिखने के लिये दबाव भी डालते । लोग उसे ’स्क्रैप’ क्यूं कहते थे यह आजतक मेरी समझ में नहीं समा सका । मैं पूरे समय ’औरकुट’ का सदस्य बनने के सपने देखता ही रहा कि तब तक हल्ला मचा कि ’फेसबुक’ आ गया है । लोग जो ’औरकुट’ के चरणों में बैठे थे वे उसके खड़ाउं छोड़कर ’फ़ेसबुक’ की ओर लपके । राजा भरत को श्रीराम मिले । आंसुओं की धार निकल पड़ी । लोग निहाल हो गये (बाद में कुछ लोग बेहाल भी ) । जितनी फोटो ’औरकुट’ पर डली थीं, उतरने लगीं और रातो-रात ’फेसबुक’ पर सजने लगीं । ऐसा राज्याभिषेक किसी काल में किसी का भी नहीं हुआ । आधी से अधिक दुनिया आज ’फेसबुक’ पर अपनी उपस्थिति से स्वयं कृतार्थ हो और दूसरों को भी कर रही है ।



            कुछ लोग सुबह आंख मलते, बिना दांत मांजे, चश्मा धारण कर कम्प्यूटर के आगे बैठ जाते हैं । अपनी नहीं तो उधार ली हुई सूक्तियों के साथ लिखते हैं – सुप्रभात । आजकल फेसबुक पर सन्देश देने के लिये भी सुबह उठना हो जाता है । बड़े-बुजुर्ग जो कह कहकर थक गये आज वह फेसबुक की कृपा से सम्भव हो पा रहा है । स्नान-ध्यान, नाश्ता-पानी करते समय भी सोचते रह्ते कि कुछ ’ठोस’ लिखना होगा । लेकिन इतना भर लिख पाते हैं – आफ़िस जा रहा हूं । आफ़िस पहुंच कर लिखते हैं – आफिस पहुंच गया हूं । दिल लग नहीं रहा । दिल लगे भी तो कैसे, काम दिल लगाने की चीज तो है नहीं । फ़िर लिखते हैं – व्यस्त हूं (यह पता नहीं चलता कि काम में अथवा…) । देखते-देखते दोपहर हो जाता है । समय रुका तो रहता नहीं । लिख देते हैं – लंच करने जा रहा हूं । जल्दी-जल्दी में लंच करने के बाद लिखते हैं – आह…घर का भोजन, मजा आ गया और मां की याद भी आ गयी (भोजन पत्नी ने बनाया था वैसे ) । लंच के बाद भरपेट अलसाते हुए फ़िर लिखते हैं – आफ़िस के बाहर का नज़ारा अद्भुत है । धूप है तो धूप, बरसात है तो बरसात और जो कुछ नहीं तो धूप अथवा बरसात अथवा दोनों की उम्मीद । कुछ और नहीं सूझता तो लिख देते हैं – आज ही के दिन पचास साल पहले जन्मे थे, अथवा शादी हुई थी (नौकरी लगने की बात अनदेखा कर देते हैं )। अगर ऐसा कुछ व्यक्तिगत नहीं हुआ था तो किसी न किसी महान हस्ती का कुछ न कुछ हुआ ही होगा, वही लिखकर कभी नमन तो कभी अफ़सोस कर लेते हैं । समय फ़िर गुज़रने लगता है । घड़ी-घड़ी की खबर दर्ज़ करते रहते हैं  - कहीं चुनाव, तो कभी क्रिकेट, कोई साहित्यिक-सांस्कृतिक समारोह, गली-गली, शहर-शहर, देश-विदेश के समाचार पढते और फेसबुक पर डालते रहते हैं । यह सब निस्वार्थ-निष्काम भाव से बिना कोई फल की आकांक्षा के करते रहते हैं । ठीक वैसे ही जैसा कि श्रीकृष्ण ने महाभागवद्गीता में कहा है । अर्जुनजी को तो गीता के उपदेश के बाद ज्ञान मिला था लेकिन इनको तो फेसबुक ने मुक्ति-मोक्ष का मार्ग दिखला दिया । ऐसे ही कितने मुमुक्षू रात-दिन फेसबुक के माध्यम से रात-दिन अपनी साधना में लीन रहते हैं । बिना लिखे-पढे अगर आधा घंटा निकल जाय (कोई बहुत ही ज़रूरी काम आ जाये तो ही ) तो लगता है कि सांस अटक गयी । जीवन लक्ष्य से भटक गया । दम घुंट गया । वह जीवन भी क्या जहां अभिव्यक्ति नहीं और वह अभिव्यक्ति भी क्या जहां साझा करने, सुनने-सुनाने और पढने-पढवाने की सुविधा नहीं । शाम हो जाती है । सुबह और दोपहर के बाद शाम ही होती है लेकिन वह बताना नहीं भूलते । शाम को चलते हुए लिख जाते हैं – थक गया हूं (सम्भवत: काम की जगह शाम का इन्तज़ार करते-करते) । घर आकर चहककर लिखते हैं – शाम की चाय के साथ आप सबको एक बार फ़िर नमस्कार । दिन भर की थकान शाम को फेसबुक पर आकर मिट जाती है । 

पुरानी डायरी से कुछ जुमले निकालकर फेसबुक पर डाल देते हैं और मित्रों से प्रतिक्रिया लेने देने में शाम गुज़रने लगती है । ’खाने जा रह हूं’ और ’खा चुका’ के बीच का समय मुश्किल से कटता है कि फिर सन्देश देते हैं – मित्रों मैं आ गया । यही करते-करते आधी रात हो जाती है तो लिखते हैं – पता ही नहीं चला कि समय गुज़र गया। रात के बीते जाने पर एक-आध पंक्ति लिखना न भूलते हुए कह जाते हैं – शुभ रात्रि, कल फ़िर मिलेंगे।.. सच सोशल नेटवर्किंग ने आदमी को जीवन में एक नया आयाम दे दिया है। कल तक जो ज़िन्दगी से बोर हो गये थे आज उनमें एक नई ताज़गी भर आयी है । सोचता हूं कि यह सब इतनी देर से क्यों हुआ । कितनी पीढियां बोर हो-होकर चल बसीं । खैर, आज याद करने वाले उन्हें भी यहां भर-भर कर याद कर रहे हैं ।



            कुछ लोग थोक में मित्रता करते हैं । और बताते भी चलते हैं कि आ्ज उनके मित्रों की संख्या इतनी हो गयी । दर्जन की गलियों से शुरु होकर, सैकड़ों और हजारों के चौराहों को पार कर वे लाखों की दौड़  में लगे हैं । बिना रूके, हांफे और थके । अगर जो यह सोशल नेटवर्किंग पहले यानि बहुत पहले होता तो कोई महाभारत अथवा विश्वयुद्ध नहीं होता । मित्रों में भी भला लड़ाई होती है ? लेकिन ऐसा नहीं, जैसा कि मित्रों की संख्या में बाढ़ आयी है, उनमें  सभी मित्र ही नहीं होते । कुछ तो आपके पक्के दुश्मन हैं लेकिन मित्र बने बैठे हैं । कहा भी गया है कि किसी से से अच्छी शत्रुता निभानी हो तो पहले उसके विश्वासी मित्र बनो । जितनी दुश्मनी आप दोस्त बनकर कर सकते हैं उतनी दुश्मन बन कर नहीं । यह मैं नहीं कह रहा हूं यह तो ’वसुधैव शत्रुम’ में विश्वास करने वाले शत्रुवादियों का उद्घोष है । ऐसे लोग गली-गली, नुक्कड़ों में घुसकर लोगों के मित्र बनकर उनकी आलोचना-प्रताड़ना करते हैं । ऐसे लोग कुछ खास सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक सिद्धांतों को दूसरों पर थोपना चाहते हैं । थोप तो वैसे अच्छे-अच्छे लोग देते हैं तो ये इतने गये-गुज़रे भी नहीं । अन्तत: लोग उन्हें ’अमित्र’ (अनफ़्रेंड) कर देते हैं यानि मित्रता महामंडली (चार यार से अधिक बड़ी मंडली ) से निकाल देते हैं । ये निस्काषित चाणक्य दूसरे रूप धारण कर (नाम और लौग इन) फ़िर उनके किले में सेंध लगाना शुरु कर देते हैं । ऐसे मामलों में खुफ़िया एजेंसियों ने भी अपनी दक्षता दिखलायी है । एक रिपोर्ट के अनुसार आपराधिक गतिविधियों को पहले धर-दबोचने के लिये खुफ़िया एजेंट भी आपके मित्र बन कर आप पर नज़र रखते हैं ।



जब आप किसी के मित्र बनते हैं तो उसकी तस्वीरों, उसके विचारों और संदेशों को पसंद करना आवश्यक होता है । यही नहीं कुछ लोगों का कहना है पसंद तो कोई भी (दूर-दराज वाले भी ) लेता है, मित्र के लिये तो अच्छे-अच्छे ’कमेंट’(प्रतिक्रिया) देना ज़रूरी है । ये कुछ स्व-निर्धारित आचरण (कोड आफ़ कंडक्ट) हैं जिनका पालन सोशल नेटवर्किंग के लिये आवश्यक है । अन्यथा आपके मित्र आप से असंतुष्ट हो जायेंगे और बात आपको मित्र-सूची से बाहर कर देने तक आ जायेगी । जहां मित्रता सहज उपलब्ध है वहीं उसके बने रहने की कोई गारंटी नहीं है । दूसरी तरफ़ लोग हैं जो कुछ भी पसंद (लाईक) करते हैं । प्रतिक्रिया (कमेंट) में कुछ लोग कविता भी लिख देते हैं । कुछ लोग प्रतिक्रिया स्वरूप शालीनता का सरोवर ही बहा देते हैं । यह अक्सर एक दूसरे के प्रति, अथवा किसी महान हस्ती के लिये होता है । अब सामने वाला आपकी तारीफ़ करे तो आप कैसे ना करें । रही बात बड़े लोगों की तो उनकी कृपादृष्टि पाने के लिये तो लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं । और बड़े लोग इस रहस्य को भली-भांति जानते भी हैं । इतना विनम्र और विनीत तो तुलसीदास भी नहीं हुए कभी (उन्होंने दास्य भाव में अधिक लिखा है ) । कुछ लोग प्रतिक्रिया देते हुए अपनी कथा-कविता कह देते हैं, लिन्क प्रदान करते हैं और कभी तो आग्रह और कभी तो आदेश (अपने कद और वरीयताक्रमानुसार) देते हैं कि फ़लां जगह पधारें और अपने विचार दें । अगर जो आप ऐसा न करे तो परिणाम के लिये तैयार रहें । सोशल नेटवर्किंग के मित्र इस मामले में थोड़े असहिष्णु अवश्य हैं । अब मित्र हैं तो क्या उम्र भर बिना कुछ लिये दिये ही निभाते फिरेंगे ? अब कुछ लोगों की विवशता भी देखिये कि आखिर ’तारीफ़ करें’ भी तो कब तक ? उनके हजारों मित्र और दसों हजार संदेश – किसे पढे, किसे देखें, किसे छोड़े, किसको पसंद करें और किस-किस पर कमेंट करें । डिजिटल कैमरा आने के बाद (और अब तो प्राय: हर मोबाईल फोन में भी ) तस्वीर खींचने में कन्जूसी नहीं करनी पड़ती । लोग, स्थान, परिवेश स्थिर ही रहते हैं लेकिन कैमरे के बीस-पच्चीस क्लिक हो जाते हैं । लोग तस्वीरों को कैमरे से सीधे इन्टरनेट अथवा सोशल नेटवर्किंग के स्थानों पर डाल देते हैं । कुछ तस्वीरों में अन्धेरा छाया रहता है तो कुछ में सूरज की तेज रोशनी के कारण सब कुछ सफ़ेद हो जाता है तो कुछ में यह कहना कठिन होता है कि तस्वीर किसकी है – आदमी की अथवा कुत्ते की या सड़क के किनारे घास चर रही बकरी की । बहुत तस्वीरें उलटी टंगी हैं । लेकिन साझा करने की आतुरता में इन सब पर ध्यान देने का अवकाश नहीं । ’लोग खुद समझ लेंगे ’ अथवा ’ आज के समझदार लोग ’ की उम्मीद में हजारों तस्वीरें आपके अवलोकनार्थ और प्रतिक्रिया के लिये उमड़ पड़ी हैं । ध्यान रहे – पसंद करना काफ़ी नहीं, कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा । आखिर मामला मित्रता का है ! ऐसी ही कितनी तस्वीरें जो वर्षों पुराने अल्बम से निकल कर आज सोशल नेटवर्किंग के सौजन्य से इंटरनेट का मुंह देख पा रही हैं । कोई अपने गांव की, बचपन की, बूढ़े माता-पिता अथवा गुजरे दादे-परदादे, स्कूल, कालेज, आफ़िस, गली-मुहल्ला जो जहां कहीं से जो कुछ भी निकाल पा रहा है, खोज पा रहा है पूरी श्रद्धा के साथ सोशल नेटवर्किंग को अर्पित कर रहा है । लोग प्रेमाकुल हैं, आंख से आंसू निकल रहे है, अपने पराये सबको याद कर रहे हैं जिनको बरसों पहले भुला दिया था । मानवता के लिये यह एक अभूतपूर्वा घड़ी है । कहीं कुछ न मिला तो लोग अपने कालेज के दिनों के प्रवेश-पत्र अथवा परिचय-पत्र से फोटो निकाल कर उसको सोशल नेटवर्किंग स्थानों पर चिपका दिया । उनके मित्र अभिभूत हो गये । किसी ने कहा – बचपन से ही होनहार लगते थे । कुछ ने कहा – कितना बदल गये हो । कितनों ने स्टूडियो और फोटो खींचने वाले की जानकारी मांगी (ताकि वे उनको सम्पर्क कर सकें !) । देखते-देखते वे कितनों के प्रेरणास्रोत बन गये । अब तो लोग सोशल नेटवर्किंग स्थानों पर डालने हेतु घर के कोने-कोने में फोटो खिंचा रहे हैं  – कभी मां से सटकर तो कभी बाबा के चरणों में, कभी आंगन में तो कभी छत पर, कभी घर की बिल्ली के साथ तो कभी गली के कुत्ते के साथ । और नहीं तो अपने शहर की सब्जी मंडी अथवा निर्जर पार्क में ही खड़े हो गये और दर्जन भर तस्वीरें ले लीं । कहीं कोई पोखर (जमा पानी अथवा नाला भी चलता है ), झील, बाज़ार, मंदिर-मस्ज़िद, चर्च, सार्वजनिक महत्त्व की वस्तु अथवा स्थान नहीं बचा जहां लोगों ने तस्वीरें नहीं खिंचवायीं। यहां तक कि लोग अब घर में खाना छोड़ रेस्त्रां जाने लगे ताकि वहां की तस्वीरें डाल सकें । घर में भी खाना बनाया तो सम्बन्धियों और अतिथियों को खिलाने से पहले कैमरे का फ़्लैश चमक उठता है । पहाड़ों और तीर्थों का तो कहना ही क्या, लोग अपनी सामर्थ्य से बाहर आकर भी यात्रा करने लगे ताकि सोशल नेटवर्किंग पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा सकें । बिना सामाजिक रहे जीवन का मूल्य ही कितना हैं । बहन भाई को टीका तभी लगायेगी जब कैमरा सामने होगा, पति-पत्नी एक दूसरे को देख तभी मुस्कुरायेंगे जब उस अन्मोल घड़ी को कैद करने के लिये कोई कैमरा तैनात होगा । मां-बाबूजी के चरणों के तरफ़ हाथ बढे हैं लेकिन आंखें कैमरे पर टिकी है । कैमरा सामने हो तो बच्चे भी प्यारे लगते हैं ।



हर तरफ़ समाजवाद छाने लगा है – कोई अमीर, नहीं कोई गरीब नहीं, कोई हिन्दू नहीं कोई मुसलमान नहीं । हिन्दू मुसलमान को ’ईद मुबारक ’ कहता तो मुसलमान हिन्दू को ’दिवाली शुभ हो’ कहने लगे । हर दिन बिना किसी भूल के दुनिया के सारे महापुरुष याद किये जा रहे हैं और लोग उनको श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं । अब किसी का जन्म दिन याद रखने की आवश्यकता नहीं – सारे रिश्ते-नाते, मित्र, आफ़िस आदि के लोग एक दूसरे से सोशल नेटवर्किंग से जुड़े हैं । सोशल नेटवर्किंग आपको याद दिला रहा है कि कब फ़लां का जन्मदिन अथवा कोई अमुक महत्त्वपूर्ण सालगिरह है । लोग बिना भूले-चुके मुबारकबाद और बधाईयां भेज रहे हैं । लोग पढ-पढ कर अभिभूत हो रहे हैं । बगल के कमरे से भाई बहन को जन्म दिन की बधाई सोशल नेटवर्किंग साईट पर लिख रहा है क्योंकि बहन ने कहा था मुंह से अब क्या कहना जो कहना है अब सोशल नेटवर्किंग स्थान पर कहो-लिखो । तभी तो पता चलेगा कि लोग उसे कितना पसन्द करते हैं । माता-पिता भी बच्चों को आशीष सोशल नेटवर्किंग पर ही दे रहे हैं । हर तरफ़ उत्साह, उमंग और उछाल है । भावनाओं का सागर उमड़ पड़ा है , अभिव्यक्ति की ज्वालामुखी फट पड़ी, प्रदर्शन की ‘सुनामी’ आयी है । सब लोग बह रहे हैं , कोई थमना नहीं, रूकना नहीं , सोचना-समझना नहीं ….

यह सब लिखते हुए मुझे लगता है कि मैं समय के साथ कदमताल नहीं कर पा रहा हूं । मित्रों की, सम्बंधियों की आशाओं के अनुरूप मैं ढ़ल नहीं पाया । मैं हर दिन, हर पल पिछड़ता जा रहा हूं । सामाजिकता की इस प्रलयकारी बाढ़ में मैं एक तिनका-सा बहा जा रहा हूं, डूबता-उतराता, कहां, किस ओर कुछ पता नहीं ..



उम्मीद है कि मैं भी इन कड़ोरों-अरबों की तरह एक दिन समाजिक बन पाउंगा…



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Saturday, November 5, 2011

कहानी संग्रह "गांधीजी खड़े बाज़ार में" की समीक्षा

मेरे दूसरे कहानी संग्रह "गांधीजी खड़े बाज़ार में" की समीक्षा डा. शैलजा सक्सेना जी ने लिखी है जिसे आपसे साझा कर रहा हूँ - अमरेन्द्र कुमार

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"गाँधी जी खड़े बाज़ार में"- अमरेन्द्र कुमार

-डॉ. शैलजा सक्सेना


अमरेन्द्र कुमार का यह दूसरा कहानी संग्रह है। पिछले कहानी संग्रह की तरह ही इस कहानी संग्रह की प्रत्येक कहानी भी लेखक के चिंतनशील, सूक्ष्म-अन्वेषक और विश्लेषणशील व्यक्तित्व और उसकी विशिष्ट शैली को बता रही है।

कहानियों से पहले कहानी विधा पर लेखक का वक्तव्य अत्यंत रोचक है। कहानी विधा की क्रिकेट की गेंदबाज़ी, पहाड़ी रस्ते से गुज़रने और तीर्थयात्रा से तुलना करते हुए लेखक ने कहानी लिखने से पहले और कहानी लिखते समय के अनुभव को बहुत बारीकी से बताया है। इस वर्णन से पता लगता है कि लेखक, कहानी लिख कर ही अपने कर्तव्य की इति श्री नहीं समझता अपितु एक ज़िम्मेदार कहानीकार की तरह कहानी लिखने\पढ़्ने वालों से कहानी लिखने की कला संबंधित अपने विचार भी साँझा करता है।

इस कहानी संग्रह में आठ कहानियाँ हैं। इस संग्रह की प्रारंभिक चार कहानियाँ और अंतिम कहानी आत्मपुरुष शैली में कही गई है। लेखक या तो घटना को देख रहा है (गाँधी जी खड़े बाज़ार में) या वह कहानी में एक अन्य चरित्र की तरह है (तलाश, एक दिन सुबह) या वह अपनी ही कहानी कह रहा है (पहला सबक, एक अरसे के बाद), शेष तीन कहानियाँ अन्य पात्रों के माध्यम से कही गई हैं। लेखक वहाँ "मैं" के रूप में उपस्थित नहीं है। जब कहानी आत्मपुरुष की शैली में कही जाती है तो कहानी में एक अलग तरह की विश्वसनीयता पैदा होती है, कहानी से लेखक का भावात्मक लगाव दिखाई देता है और जब कहानी "मैं" के जीवन को बता रही हो तो उसमें आत्मिक विस्तार के कई आयाम सहज ही उभरते दिखाई देते हैं, साथ ही कई बार यह डर भी होता है कि लेखक का व्यक्तित्व पात्रों पर हावी न हो जाये पर अमरेंद्र की इन कहानियों की विशिष्टता यह है कि लेखक इन कहानियों की घटनाओं या पात्रों का नियंत्रक नहीं है, घटनायें उसके चाहे-अनचाहे ही हो रही हैं और पात्र उसके अनुसार व्यवहार करते हैं। इन घटनाओं के प्रति वह कोई चौंकाने वाली प्रतिक्रिया भी प्रकट नहीं करता केवल इन घटनाओं को विस्तार से खोल कर हमारे सामने रख देता है। घटनाओं का विस्तार, उनका बारीकी से अंकन, उनका सहज विश्लेषण और इन सबके बीच सहज गुँथा लेखक का व्यक्तित्व, यही इन कहानियों की विशेषता है।

प्रारंभिक चार कहानियाँ अलग-अलग विषय वस्तु लिये हैं, हाँ इनमें से दो कहानियाँ नौकरी पाने के आसपास ज़रूर घूमती हैं पर इन कहानियों को एक साथ पढ़्ते जाने से एक अलग ही चरित्र उभरता है, यह लेखक का अपना चरित्र है, मुझे ऐसा लगता है। लेखक एक सूक्ष्म द्र्ष्टा, असीम धैर्य वाला (पहला सबक), कुछ-कुछ दार्शनिक और अपने विषय में बहुत ईमानदार व्यक्ति है। उसकी टिप्पणियाँ, जो प्राय: घटनाओं के कपड़े पर कसीदे के रूप में उभरती हैं, बहुत स्पष्ट, कम शब्दों में बहुत कुछ कहने वाली और ईमानदार होती हैं चाहें ये टिप्पणियाँ उसके अपने विषय में हों या किसी घटना पर या वस्तुस्थिति पर हों। ये टिप्पणियाँ एक वातावरण उपस्थित करती हैं। एक ह्ल्की दार्शनिकता के कुहरे में घटनायें ढ़की रहती हैं, घटनाओं का प्रवाह मंथर गति से चलता रहता है और पाठक के साथ-साथ लेखक भी उसमें बहता हुआ दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में लेखक एक कमेंट्रेटर (आँखो देखा हाल कहने वाले) के रूप मे अधिक उभरता है, कहानियों के नियंत्रक के रूप में कम। "तलाश" जैसी कहानी में भी घटनाओं का प्रवाह ही कहानी को निर्धारित कर रहा है, लेखक का स्वयं उन घटनाओं पर नियंत्रण नहीं है पर इन घटनाओं के बीच वह एक दृढ़ प्रतिज्ञ के रूप मे उभरता है। कहानियों के पात्रों की खूबी इन घटनाओं की प्रतिकूलता में भी आगे बढ़ते रहने का साहस दिखाने में है, घटनाओं के नियंत्रण का प्रयास करने में नहीं। यहाँ वह नियतिवादी सा दिखाई पड़ सकता है पर वह नियतिवादी है नहीं। घटनाओं को बदला नहीं जा सकता पर उन घटनाओं के प्रति जो हमारी प्रतिक्रिया है, उस पर हमारा नियंत्रण है, इस सत्य को इन कहानियों के नायक जानते है इसलिये "तलाश” में दिनभर धूप में खड़े रहने के बाद भी न तीव्र झल्लाहट है, न "पहला सबक" में पैसे चोरी हो जाने पर क्रोध, न बीच रास्ते, अनजाने शहर में स्कूटर ख्रराब हो जाने पर बौखलाहट। केवल "पहला सबक" के प्रारंभ में नौकरी की परीक्षा का स्वीकृति पत्र न आने पर चिंता दिखाई देती है। चारों कहानियों में हमें किसी भी स्थिति पर पात्रों की कोई प्रतिक्रिया फट कर होती नहीं दिखाई देती है, इसी लिये सब कुछ एक दार्शनिक सोच, एक मध्यवर्गीय गंभीरता (जो आर्थिक सीमाओं और पारिवारिक मूल्यों के बीच से पैदा होती है) और एक समझदार धैर्य के कुहरे में घटता दिखाई देता है।

कहानी संग्रह की प्रथम कहानी इस पुस्तक की शीर्षक कहानी है: "गाँधी जी खड़े बाज़ार में"। सच कहूँ तो यहाँ "जी" शब्द का होना भी अपने आप में एक सुखद आश्चर्य है। जहाँ आज के लोग अपने रिश्तेदारों को आदर से बुलाना अपना अपमान समझते हैं, जहाँ गाँधीवादी विचारधारा के आलोचकों से "काँग्रेसी" का बिल्ला लगाये जाने का डर होता है वहाँ सहज भाव से, अपने से बड़ों को "जी" लगा कर बात करने की मानसिकता के चलते अमरेंद्र ने अपनी इस कहानी और कहानी संग्रह के शीर्षक में जी लगा दिया है। इस कहानी में व्यंग्य भी यही है कि गाँधीजी अब प्रदर्शन और पैसे कमाने का एक साधन हैं, आदर और श्रद्दा का नहीं। एक वृद्द आदमी को गाँधीजी की वेश-भूषा में दुकान के बाहर खड़ा कर के दुकानवाला गाँधी जयंती के दिन अपनी आमदनी बढ़ा रहा है, लोग देखते हैं, मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते हैं, वह वृद्द अपनी टेढ़ी कमर को सीधा करने का अधिकार नहीं रखता, गर्मी में पसीना बहाते हुए, बिना पानी पिये वह धूप में खड़ा रहता है, ज़रा सा हिलने पर उसे मैनेजर से और दुकान के बेयरे से डाँट खानी पड़्ती है और इस तरह गाँधी के नाम पर यह अमानवीय काम होता है। कहानी का व्यंग्य और भी तीखा तब हो जाता है जब एक महिला अपने बच्चे को डाँटते हुए "गाँधी" बने वृद्ध से दूर ले जाती है कि अजनबियों से बात नहीं करते, वह बच्चा कहता भी है कि यह तो गाँधीजी हैं पर माँ कहती है कि "तुम्हें कैसे मालूम?" यह बातचीत अँग्रेज़ी में होती है। हिन्दी भाषी बापू के जन्मदिन पर इस बात से बड़ा व्यंग्य क्या होगा कि ना उन के प्रति लोगों में श्रद्दा है, न ही लोगों को उन की पहचान है और न ही उनकी मान्यताओं और मूल्यों का कोई महत्व है। आज के ज़माने में बापू की स्थिति और बाज़ारवाद पर तीखा व्यंग्य करने में अमरेंद्र को इस कहानी में पूरी सफलता मिली है।

"एक दिन सुबह" कहानी का कथानक रुचिकर है। यह कहानी सुबह के कुछ घंटों की है। इसकी विस्तॄत पृष्ठभूमि दी गई है। लेखक के पात्र "मैं" ने विस्तार से रिटायरमेंट के बाद रहने की जगह को लेकर अपनी पसंद, नापसंद का वर्णन किया है जिसका मुख्य कहानी से कोई विशेष संबंध नहीं है। इस लंबी भूमिका में बात केवल इतनी है कि "मैं" उस शहर में नया है। कहानी का मुख्य पात्र वह व्यक्ति है जो पार्क में टहलने आये "मैं" से समाज की स्वार्थ और लाभ प्रवृति पर बहुत सी बातें करता है। वह बताता है कि वह जामियामिलिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाता है। इतनी रोचक और समाज के गहरी अन्वेषक चर्चा की समाप्ति इस जानकारी के साथ होती है कि वे सारी बातें उस व्यक्ति के अवचेतन में दबी बातें थीं, सत्य यह था कि वह व्यक्ति मैट्रिक तक पास था और एक व्यापारी रह चुका था। व्यापार हथियाने के लिये उस व्यक्ति के भतीजों ने उसे नज़रबंद कर रखा था। कहानी अच्छी तरह लिखी हुई है अत: कौतुहल अंत तक बना रहता है और उसकी समाप्ति आधुनिक जीवन के मर्मस्पर्शी सत्य में होती है। यह कहानी आज के समाज में बढ़ते स्वार्थ और धन के लिये किसी भी सीमा तक गिर जाने के तथ्य को स्पष्ट करती है। कहानी में यह दिखाना कि अवचेतन में दबी इच्छायें कितनी सत्य प्रतीत हो सकती हैं, एक नयापन पैदा करता है, दूसरा विचार यह रखा गया है कि मैट्रिक पास व्यक्ति भी अपनी मान्यताओं और विचारों की प्रगतिशीलता के चलते पढ़े-लिखे स्वार्थी लोगों से बेहतर सिद्द हो सकता है।

तीसरी कहानी "तलाश" एक चित्र है-विभिन्न व्यावसायिक परीक्षाओं में आवेदन भेजने के लिये पोस्ट आफिस में लगी लंबी लाइनों का। दोपहर की चिलचिलाती धूप में पसीना बहाते बहुत से नौजवान अपने भविष्य की तलाश में वहाँ खड़े हैं, लाइनों में अजनबियों से भी दोस्ती हो रही है, पास की छोटी दुकान से लड़्का सबके लिये भाग-भाग कर चाय ला रहा है। ऐसे में कम्प्यूटर ख्रराब होना और फिर क्लर्क का घोषणा करना कि सबका काम आज ही होगा, से उपजी तसल्ली आदि दृश्य और भाव कहानी में बहुत बारीकी से प्रस्तुत किये गये हैं। कहानी के अंत में वृद्द से बातचीत, अपनी लड़की और लड़के के लिये उनकी चिन्ता कहानी को अलग ही मर्मस्पर्शी मोड़ दे देती है। यह कहानी एक बार फिर दिखाती है कि कहानी के मुख्य पात्र "मैं" का धैर्यशाली चरित्र लेखक का अपना चरित्र ही है। इस कहानी का चित्र आम होने के बाद भी अपनी सादगी और बारीकी के कारण मन पर प्रभाव छोड़्ता है। कथावस्तु रोज़मर्रा के दृश्य को दिखाते हुए भी अपने प्रस्तुतिकरण के कारण नवीन है।

कहानी "पहला सबक" में घटना क्रम है: नौकरी के लिये परीक्षा के स्वीकृति पत्र की प्रतीक्षा, परीक्षा के लिये यात्रा, नौकरी का पाना और नौकरी पर पहुँचने की यात्रा और पहुँचने पर उस नौकरी की सत्यता को जानना। इस घटनाक्रम में कोई नवीनता नहीं है। हमारे देश के लाखॊं, करोडों युवा इस त्रासद अनुभव से गुज़रते हैं और अनेकों कहानियाँ नौकरी पाने के अनेकों त्रासद अनुभवों पर लिखी भी जा चुकी हैं, इस के बाद भी अमरेंद्र की यह कहानी नई है, बहुत प्रभावोत्पादक है।

यह कहानी आम से घटनाक्रम में अनेक विशिष्टताएँ लिये हुए है। पहली विशिष्टता यह कि इस एक कहानी में अमरेंद्र वस्तुत: तीन कहानियाँ कह रहे हैं और वह भी इतनी अच्छी तरह कह रहें हैं कि ये कहानियाँ बिखरी हुई नहीं लगतीं, अपितु एक के बाद दूसरी कहानी का आना स्वभाविक लगता है। यह पाठक की उत्सुकता को एक यात्रा कराता हुआ सा लगता है। दूसरी विशिष्टता है कि सामान्य से घटनाक्रमों का बहुत बारीकी और विस्तार के साथ वर्णन किया गया है, इन विस्तृत वर्णन से जगहों और घटनाओं का जीवंत बिंब बना है, कहानी के भौगोलिक सत्य यानि जगहों का, परिवहन के माध्यमों का वर्णन अपनी जीवंतता के कारण बहुत सशक्त बिंब पैदा करता है, पाठक को विश्वास हो जाता है कि लेखक स्वानुभूत सत्य लिख रहा है, जैसे ये चित्र उसकी मानसिक एलबम से निकल कर पन्नों पर आ विराजे हों और इन चित्रों को वह उतनी ही सघनता और तीव्रता के साथ पुन: जी रहा हो जैसे उसने पहली बार वे घटनाएँ भोगी होंगी। घटनाओं और अनुभूतियों के साथ लेखक की यह प्रगाढ़ता न केवल इस कहानी को अपितु इस संग्रह की सारी कहानियों को अधिक जीवंत और विश्वसनीय बनाती है। अमरेन्द्र की इस कहानी की तीसरी विशेषता है कि यह कहानी घटनाओं के बीच घुस कर उनका विश्लेषण साथ साथ ही करती चलती है और लेखक इन स्थितियों पर टिप्प्णी भी देता चलता है। उदाहरण के लिये:" मैंने तो औटोरिक्शा की समस्या के बारे में पूछा तक नहीं। मुझॆ पता था कि बिना किसी समस्या के वे गाड़ी रोकते भी क्यों, और अगर मैं समस्या जान भी लेता तो मैं कुछ मदद भी तो नहीं कर सकता था। पर सब लोग मेरे जैसे नहीं होते। कुछ लोग औटोरिक्शा के आगे और नीचे मुआयना करने के अंदाज़ में ऐसे ताक-झाँक कर रहे थे जैसे अभी समस्या का पता कर निदान निकाल लेंगे।" इन तीन वाक्यों में कहानी का घटनाक्रम भी आगे बढ़ा, कहानी के नायक के चरित्र के बारे में भी पता लगा कि वह कितना धैर्यशाली है और तीसरा सामान्य जन-प्रवृति के बारे में सटीक टिप्पणी भी मिलती है, ऐसी अनेक टिप्प्णियाँ हमें इस पूरी कहानी में मिलती हैं। कहानी का अंत भी अपने आप में विशिष्ट है- अनेकों कठिनाइयों के बाद, अपना जीवट दिखाते हुए, नौकरी पर समय से रिपोर्ट करने की दॄढ़ता के साथ आगे बढ़ने वाले युवक को अपना भविष्य काले-काले जालों के बीच दिखाई देता है जिन्हें बरसों से साफ नहीं किया गया है। कहानी का यहीं अंत हो जाता है और लेखक शेष कहानी पाठकों की कल्पना पर छोड़ देता है कि इस नायक ने वर्षों से साफ नहीं हुए इन जालों को साफ किया होगा या नहीं। वर्षों से उस कमरे की सफाई न होना एक प्रतीक भी है कि वर्षों से उस नौकरी को एक पुराने ढ़ाँचे में ही देखा जाता रहा है। गाँव के मुखिया और गाँव के बीच इस नौकरी की "प्लेसिंग" गलत तरीके से होती आई है जिसे किसी ने वर्षों से सुधारा नही है, प्रश्न यह भी उठता है कि क्या नायक ऐसा करेगा? पर कहानी इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये नहीं लिखी गई है। कहानी का उद्देश्य " खोदा पहाड़ निकली चुहिया" की स्थिति को दिखाना जैसा है जहाँ पहाड़ खोद्ने की कठिनाइयों का विस्तृत वर्णन चुहिया की प्राप्ति की आयरनी (विडंबना) को बहुत तीखा कर देता है। अमरेंद्र इस विडंबना और व्यंग्य को सफलता से प्रस्तुत कर सके हैं।

पुस्तक की अंतिम कहानी "एक अरसे के बाद" में भावना का घनीभूत रूप सामने आता है। इस कहानी में जहाँ एक ओर अमरीका से घर वापस लौटने पर बिना माता-पिता का घर कठिन यथार्थ बन कर सामने खड़ा होता है वहीं उनकी यादें, घर लौटने पर वे क्या करते थे आदि बातें एक चुप्पी भरी मार्मिकता कहानी में पैदा करती हैं। ईश्वर के बालस्वरूप को "लल्ला" के रूप में अपनाने और उसी भाव से हर जगह अपने साथ रखने वाले परिवार के प्रति नवीन कौतुहल पैदा होता है। ईश्वर के प्रति ईमानदार लगाव, भाव आजकल की कहानियों में नहीं दिखाई देता फिर किसी तरुण परिवार के ईश्वर की बालमूर्ति को "लल्ला" के रूप में अपनाने की बात तो अचरज भरी ही मालूम देती है। पर यह अचरज भी अमरेंद्र की अन्य कहानियों कि तरह सहज भाव से आया है, चमत्कार बन कर नहीं। इस कहानी में हवाईअड्डे से घर तक टैक्सी में की गई यात्रा में जो वातावरण लेखक ने सृजित किया है, वह इस कहानी का प्राण है और इसे सजीव बनाता है।

शेष तीन कहानियाँ उपरोक्त कहानियों से अलग स्वर लिये हैं। यहाँ लेखक अपनी कहानी नहीं कह रहा है और न ही वह किसी भी रूप में कहानी में है। कहानियों के चरित्र अलग-अलग परिवेश से हैं जैसे" मोती बनाम मुक्तेश्वर" का नायक कुत्ता है, "आने वाले कल के लिये" की कहानी उस तरुण युवती की है जो माता-पिता के संबंधों के विघटन को भावनात्मक स्तर पर झेल रही है और पिता के पास जाने और माँ के पास रहने के निर्णय के बीच झूलती दिखाई देती है।

"आने वाले कल के लिये" कहानी का कथानक बहुत बड़ा नहीं है। देखा जाए तो कहानी केवल इतनी है कि नायिका के पिता, जो कि बहुत प्रसिद्द अभिनेता हैं, उसके शहर, उसके कालेज के वार्षिक समारोह में आने वाले हैं और वह अपने पिता से बहुत दिनों के बाद मिलने की उत्सुकता, आशंका, बैचेनी के बीच उस समारोह के लिये अपने नाटक को तैयार करती है। अपने पिता को वह अपनी नानी और माँ से भी मिलाती है। पिता के अपने पास आकर रहने के निमंत्रण को वह इस गिल्ट के कारण नहीं स्वीकार कर पाती कि माँ और नानी अकेले रह जायेंगे यद्दपि उसका मन पिता के पास जाने को बहुत उत्सुक है और अंत में पिता के बीमार हो जाने पर उस परिवार का पुन: मिलन हो जाता है। कहानी में ऐसा कोई पेंच नहीं है जो उसे चामत्कारिक बनाता हो, कोई ऐसी घटना नहीं जो कथापट को अनोखा बनाती हो पर पूरी कहानी में युवती की मनोभावनायें बहुत बारीकी से उभारी गईं हैं। पिता से मिलने के पूर्व, पिता के मिलने के समय और पिता के मिलने के बाद पारुल और पारुल की माँ के मन में, उन के परिवार के वातावरण में जो कुछ घटता है वह ही कहानी का मुख्य कथानक है। लेखक यह भी बताना चाहता है कि चाहें कोई व्यक्ति प्रसिद्ध हो, उम्र में बड़ा हो गया हो पर परिवार के अधूरेपन का दर्द सभी को सालता है। कहानी कुछ अधिक लंबी हो गई है और इसका कारण है कि कहानी धीमी चाल से चली है। पारुल के पुरुष मित्र का प्रसंग उसके चरित्र को बताने के लिये किया गया है या संभवत उसके माँ-पिता के विवाह पूर्व इतिहास को दोहराने जैसी स्थिति में नयी पीढ़ी की नयी प्रतिक्रिया की बात दिखाने के लिये किया गया है, परन्तु "उत्कर्ष" के चरित्र को उभरने के लिये बहुत अधिक जगह और अवकाश नहीं मिला है। जगह और समय का एक बड़ा हिस्सा वातावरण के नाम हो गया है। इस कहानी में अमरेंद्र की लेखन शैली निर्मल वर्मा की याद दिलाती है।

"कुछ सोचा है" कहानी एक नाटक की तरह है। कहानी का उद्देश्य नई पीढ़ी के व्यवहार का पुरानी पीढ़ी के व्यवहार साथ तुलनात्मक चित्र प्रस्तुत करना है। यह चित्र एक परिवार के वार्तालाप के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि उपलब्धियाँ व्यक्तित्व की पहचान बन जाती हैं और आज के समाज में यह पहचान ही बड़ी चीज़ है। इसे कहानी का तरुण नहीं समझता। यह कहानी शेष कहानियों से भिन्न है क्यों कि यह इस संग्रह की पहली कहानी है जिस में बात कहने के लिये वातावरण का बहुत अधिक सहारा नहीं लिया गया है केवल कहानी के अंत से पहले चाँद और अँधेरा पात्रों की आशा और निराशा का वातावरण प्रस्तुत करता है। कहानी के पात्र वर्तमान समाज में पढा़ई, नौकरी, पैसों, ओहदे को ले कर होने वाली प्रतियोगिता और चिन्ता पर चर्चा करते हैं। कहानी के नायक, जज साहब के तरुण पुत्र का इन सब के प्रति लापरवाही दिखाना सामाजिक मूल्यों को खारिज करने जैसा लगता है। यह बात तब और पुष्ट हो जाती है जब कहानी के अंत में रौशनी आ जाने के बार सब लोग देखते हैं कि वह पुस्तक से मुँह ढँक कर सो रहा है। यहाँ नई पीढ़ी के युवक की मन:स्थिति को दिखाया गया है कि उस के भविष्य के प्रति उसके माता-पिता और परिवार को उसकी तुलना में अधिक चिन्ता है। किशोर दो बार स्टेट एंट्रेस में फेल होने पर भी बहन के साथ झगड़ने में अधिक आनंद उठा रहा है जबकि वहाँ उसके भविष्य को लेकर पिता और उसके भाई चिन्तित हो रहे हैं। पिता के इस आग्रह पर, कि कोई पुत्र किशोर को अपने साथ ले जाये और अपने शहर में पढ़ाये, कोई तैयार नहीं होता। एक बात अवश्य ध्यान देने की है कि लेखक किशोर के माध्यम से समस्त नई पीढ़ी पर कोई वक्तव्य नहीं दे रहा है। नई पीढ़ी को आलसी या लापरवाह कहने का उसका कोई मंतव्य नहीं है क्यों कि इसी नई पीढ़ी की किशोर की बहन और भाई हैं जो पढ़ाई में अच्छे हैं और अपने अच्छे भविष्य के लिये संभव प्रयास कर रहे हैं। कहानी की नाटकीय प्रस्तुति प्रभावपूर्ण है।

"मोती बनाम मुक्तेश्वर" कहानी की कथा अलग प्रकार की है। यह एक ऐसे कुते की कहानी है जो मंदिर के बाहर बैठा-बैठा ही भक्त हो गया है। पुजारी द्वारा बहुत छोटेपन में ही बचा लिये जाने और पुजारी द्वारा ही पाले जाने के कारण मोती अन्य कुत्तों से भिन्न व्यवहार करता है। वह शाकाहारी है, आरती और भजन के समय मंदिर में बैठना चाहता है, गंगा में स्नान करता है और तो और वह पुजारी के समान ही व्रत आदि भी करता है। एक योगी के आकर यह घोषणा करने के बाद कि मोती पूर्व जन्म का शापित योगी है, मोती की प्रसिद्धि इतनी बढ़ जाती है कि दुनिया भर के लोग और पत्रकार आकर उसको देखने लगते हैं और उसके चित्र लेने लगते हैं। बहुत ही आश्चर्य तब होता है कि मोती इस कोलाहल में भी शाँत बैठा रहता है। यह कहानी धार्मिक कहानी सी अधिक लगती है पर लेखक के पिछले संग्रह की एक कहानी पर अगर ध्यान दें तो याद आयेगा कि वहाँ कहानी में चिडि़या मुख्य पात्र थी और मनुष्य के समान ही संवेदनशील थी और यहाँ मोती का धार्मिक प्रवृति का होना यह बताता है कि लेखक की संवेदनशीलता ने पशु और पक्षियों को भी समझदार और संवेदनशील माना है। इस कहानी में न कुत्ते को धार्मिक मान लेने पर व्यंग्य है, न कुत्ते को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने की चेष्टा है। ऐसा लगता है कि कहीं एक घटना घटी, लेखक को इस के बारे में पता चला और उसने गहराई से इस पर विचार किया, कुत्ते के मनोभावो, उसके स्वामी के साथ के संबंध आदि के विषय में गहरे सोचते हुए लेखक ने उस कहानी को पाठक के सामने प्रस्तुत कर दिया। अब कोई यह कहे कि कोई कुत्ता ऐसे कैसे कर सकता है तो कहना पड़ेगा कि यह ठीक उसी तरह असंभव नहीं है जैसे "जंगल बुक" में मोगली का पशुओं के साथ रह कर पशुओं जैसे व्यवहार करना।

अमरेंद्र की ये कहानियाँ एक व्यापक सामाजिक चिंता का परिणाम हैं। यह सामाजिक चिंता चाहें पुराने मूल्यों के ह्रास की हो, चाहें नौकरी की तलाश और नौकरी के स्वरूप को ले कर हो, चाहें संबंधों के विघटन को लेकर हो या अकेले रह जाने से उत्पन्न हुई हो पर प्राय: सभी कहानियाँ इस सामाजिक चिंता का परिणाम हैं। ये कहानियाँ तब पैदा होती हैं जब यह चिंता कहानीकार के मानसिक स्तर पर दिन-रात संवेदनाओं का मंथन करती है। इस चिंता की ईमानदारी और उसकी संवेदनशील अभिव्यक्ति ने इन कहानियों को बहुत प्रभावशाली बना दिया है। ये कहानियाँ समाज और व्यक्ति के बीच एक ऐसे वातावरण में घटती हैं जहाँ समाज और व्यक्ति दोनों की सत्ता बराबर से महत्त्वपूर्ण है और दोनों सकारात्मक या नकारात्मक स्तर पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह वातावरण निर्मल वर्मा के वातावरण जैसा सघन तो है पर रहस्यमय नहीं है। यहाँ पाठक इस वातावरण में होने की “चाहना” नहीं करता अपितु अपने को इस में पाता है यानि वे इन कहानियों की अनुभूति को सांझा कर पाता है। कहानी को घटना से वातावरण तक और चरित्रों की अनुभूति को पाठकों की अनुभूति से जोड़ने में लेखक ने सफलता प्राप्त की है।
अमरेंद्र के लेखन की यह भी विशेषता है कि वे सामान्य से दिखने वाले घटना क्रम में भी चरित्रों का सूक्ष्म भावांकन और वातावरण का सशक्त प्रयोग कर हर कहानी को विशिष्ट बना देते हैं। कहानी के पात्र उस वातावरण से प्रभावित होते हैं, नियंत्रित होते हैं और उनका चरित्र इस वातावरण के माध्यम से उभर कर हमारे सामने आता है। यह वातावरण केवल बाह्य प्रकृति का ही नहीं है अपितु पात्रों के मन और दिमाग में चलने वाले विचारों और भावों से भी मिल कर बना है। अमरेंद्र इस बाह्य और आंतरिक वातावरण की सूक्ष्म विवेचना करने में सिद्दहस्त हैं। मनोभावों का यह सूक्ष्म विवेचन, विश्लेषण अमरेंद्र को अपनी पीढ़ी के अन्य कहानीकारों से अलग करता है और बताता है कि अमरेंद्र में एक अच्छे कहानीकार के सभी लक्षण हैं।

अमरेन्द्र का पिछला कहानी संग्रह भी कला और कथ्य की दृष्टि से उत्तम था, कहानियाँ पाठकों का मन बाँधती थीं और यह संग्रह भी उसी संश्लिष्ट कथा-विन्यास और सशक्त शिल्प का विस्तार है। इस कहानी संग्रह की सभी कहानियाँ उच्च स्तर की हैं और पाठकों को पसंद आयेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है। यह कहानी संग्रह बताता है कि कहानी विधा का भविष्य उज्ज्वल है। इस सफलता के लिये अमरेंद्र को बधाई!!

डॉ शैलजा सक्सेना
टोरोंटो, कनाडा

सम्पर्क: shailjasaksena@hotmail.com, shailjasaksena@gmail.com
http://sanjhepal.blogspot.com/

कहानी संग्रह-- गाँधीजी खड़े बाज़ार में, कहानीकार-अमरेंद्र कुमार, पन्ने-१२८, मूल्य : २०० रूपये, प्रकाशकः मेघा बुक्स, एक्स ११, नवीन शहादरा, दिल्ली 1100३२

Sunday, September 4, 2011

संपूर्णता और संपन्नता का संगम कहानी संग्रह "गांधीजी खड़े बाज़ार में"


पिछले दिनों सुश्री देवी नागरानी अमेरिका प्रवास पर थीं. उन्होंने मेरे दूसरे कहानी संग्रह "गांधीजी खड़े बाज़ार में" की समीक्षा लिखी जिसे आपसे साझा कर रहा हूँ - अमरेन्द्र कुमार
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संपूर्णता और संपन्नता का संगम कहानी संग्रह "गांधीजी खड़े बाज़ार में"

लेखन कला की मांग है सम्पूर्णता और सम्पन्नता. लिखना कोई शब्दों की इमारत गढ़ना नहीं है, मानव मन के भीतर की उथल-पुथल, अहसासों का मंथन, जब लगन एवं कथ्य शिल्प से तराश कर एक मुकम्मल स्वरूप पाता है तब वह एक बिम्ब को जन्म देता है और लिखना भी तब ही साकार हो पाता है. यहां मुझे श्री हिमांशु जोशी जी का कथन याद आता है - "लिखना स्वयं एक तपस्या है, आधे मन से लिखा साहित्य अधूरा ही रह जाता है, व्यक्त हुए बिना....!"

लेखन की पहली कसौटी यही है कि वह पाठक को अपनी रौ में बहा ले जाया. लेखक का रचनात्मक कौशल मानवीय संबंधों को उजागर करता हुआ कहानी का रूप धारण करता है, जहां पात्र और परिवेश की कलात्मक अभिव्यक्ति से कहानियां परिपक्वता पाती है. ऐसी ही कलात्मक सम्पूर्णता श्री अमरेन्द्र कुमार की कहानियों में पायी जाती है, जिनका पहला कहानी संग्रह " चूड़ीवाला और अन्य कहानियां " अपनी रचनात्मक ऊर्जा से अपनी पहचान पा चुका है और उनका यह दूसरा कहानी-संग्रह "गांधी जी खड़े बाज़ार में" अब हमारे हाथों में है. उनके अपने शब्दों में, " एक कहानीकार का असली कथ्य उसकी कहानियां ही है.." तो आईये उनकी कहानियों की यात्रा में पात्र, परिवेश और समाज, यहाँ तक की लेखक के साथ हम भी इस तीर्थ के सहयात्री बनें. कहानी लिखना भी तो एक तीर्थयात्रा है.

समाज में हर रोज सामना करते नौजवानों की समस्या है, नौकरी की तलाश! आये दिन की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्यायों में इज़ाफ़ा करती यह समस्या "पहला सबक" बनकर सामने आई है. सच ही तो है - पढ़ा-लिखकर, सर्टिफिकेट की तहों को संभालते-संभालते आज का नौजवार हताश-सा हो जाता है, जब राज्य सरकार की ओर से कुछ हजार रिक्तियों के लिए दस लाख से ऊपर आवेदन आ जाते हैं. नौकरी के लिए आवेदन पत्र भेजने से लेकर, प्रवेश-पत्र पाने के आशावादी सफ़र तय करने के पश्चात, पुरसकूं जायज़ बनता है बुलावा पत्र, जिसके आते ही एक नए सफ़र का, यानी अपने निश्चित स्थान पर पहुँचने का विवरण. उफ़ !! विपत्तियों की चिंता भी कहाँ उसे सुविधाजनक बन पाती है.

चुनौतीपूर्ण यात्रा साधनों का इस्तेमाल करते हुए, हालातों की कशमकश से गुजरने के पश्चात भी देखिये किस सुन्दरता से सकारात्मक दार्शनिक पहलू सामने उभरा है - थकावट एक छतरी की तरह मन और शरीर पर तनी होने के बावजूद भी लेखक अपनी सोच की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए अपने हौसलों के साथ लेकर हर कदम पुख्तगी से ज़िंदगी की पगडंडियों पर धरते हुए लिखता है - "कुछ समय हमारे जीवन में ऐसा आता है जब इच्छा और अनिच्छा का अस्तित्त्व मिट जाता है, सिर्फ काल और उसकी गति रहते हैं जो निरंतर चलायमान होते हैं. " सुखद समाचार यह रहा कि कहानी का किरदार अपनी मंजिल तक आन पहुँचा, एक नए सफ़र की शुरुआत के लिए ! अमरेन्द्र जी की भाषा, शैली में एक ख़ासा आकर्षण है जो पढ़ते रहने पर कभी बोरियत को पास फटकने नहीं देता, पढ़ते हुए आभास होता है जैसे हम पाठक भी उस सफ़र के हम सफ़र हैं.
ऐसी ही एक कहानी "तलाश" में भी परिवेश की साधारण समस्याओं और हासिल न होने वाले समाधानों की ओर इशारा है. दस रिक्तियों के लिए दो लाख आवेदन पत्र पाए जाते हैं और इसी दौरान सामाजिक व्यक्ति अपनी अपनी शिक्षा की मरीचिकाओं के बाहर निकलकर जीवन की सच्चाईयों से आँख मिलाने के लिए कतारों में खड़े पाए जाते हैं.

दरअसल साहित्य एक ऐसा लोकतंत्र है जहां हर व्यक्ति अपनी क़लम के सहारे अपनी बात कह और लिख सकता है. यह आज़ादी उसका अधिकार है पर नियमों की परिधि में रहकर. इसी क्रांतिमय साहित्य के माध्यम से समाज की आसपास की समस्याओं को कथा या कहानी की विषय वस्तु बनाने से समाज के बदलाव की अपेक्षा की जा सकती है. एक तरह से साहित्य और समाज एक दूसरे के सहयोगी हैं. "एक दिन सुबह" कहानी भी इन्ही सब उलझी हुई कड़ियों की पेचकश है जिसमें रिटायर्ड जीवन में किरदार की अपनी दिन भर की दिन-चर्या और सुबह टहलने से लेकर आस-पास के कुदरती सौंदर्य का वर्णन है. फिर पार्क में जाने अनजाने लोगों से रोज़ मिलते हुए एक नया रिश्ता कायम हो जाता है और वहां कभी किसी बात पर, कभी किसी बात पर चर्चा होने की संभावना बनी रहती है. यहां समाज के मूल्यों के "तब और आज" के तुलनात्मक लक्ष्य ज़ाहिर किये गए हैं, जहां भाषा के शिल्प सौंदर्य के अनेक अंश अमरेन्द्र जी की लेखनी से अभिव्यक्त हुए हैं. बदलाव को लेकर वे लिखते हैं - "कुछ परिवर्तन एक खतरनाक षडयंत्र की तरह आता है या लाया जाता है. यह ऐसे धीमे ज़हर की तरह है कि हम मृत्यु की तरफ तो बढ़ते हैं लेकिन हम उसे विकास का नाम देते चलते हैं...!" विकास के पुराने और नए मूल्यों में कोइ संधि नज़र नहीं आती. पहले समाज के लोगों के भले के लिए प्रयत्न हुआ करते थे, अब हर कार्य को करने के पीछे एक बौद्धिक आधार होता है. अब वे प्रयास सियासत की चौखट पर व्यापार और सौदेबाज़ी की दुकानें सी लगने लगे हैं. इस कहानी में बड़े ही सलीकेदार शैली और शब्दावली से मानवता के सिद्धांतों को सोच, कथनी और करनी को हित और अहित के पलड़ों पर तोला गया है.

ऐसे परिवेश में तब्दीलियाँ आये दिन, आये पल आँखों के सामने रक्स करती हैं. उसी धरातल पर खड़ा होकर रचनात्मक ऊर्जा से लेखक, ऐसी ही किसी सुलगती चिंगारी के तहत अपने ही अंदर का कोई हिस्सा अभिव्यक्ति के माध्यम से व्यक्त करके अपनी पहचान पा लेता है, कभी शब्दों का जाल बुनकर अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करता है, तो कभी भीतर की भावनात्मक अहसासों को एक आकार देकर चिंतन की आधार शिला पर कहानी का भव्य भवन बनाता है.

एक अच्छी कहानी में कला और कथ्य के बीच का एक संतुलन का बरक़रार होना, अमरेन्द्र जी के तेजस्वी बयानों में पारदर्शी रूप से पाया जाता है. पठन के दौरान कहानी के तत्त्व, उनके पात्र, परिस्थितियाँ अपने अन्दर के संसार से तालमेल खाती हुई लगती है जैसे सभी एक ही डगर की यात्रा के सहयात्री हैं. कहानियों की श्रृंखला में एक कड़ी और "कुछ सोचा है" में बचपन से वृद्धावस्था तक विकसित और पुष्ट होती हुई प्रवृति के असर पर रोशनी डालते हुए कथाकार ने उस पीढ़ी और उस पीढ़ी की सोच को सलीके से ज़ाहिर करते हुए लिखा है - "जीवन के किसी मोड़ पर कई बार अपने भी इतने दूर निकल जाते हैं कि उनको पहचान पाना मुश्किल लगने लगता है. उनके ख्याल, उनकी सोच, और वे खुद आपकी पहुँच के बाहर हो जाते हैं, कुछ ख़ास अजनबियों की तरह - एक मुलायम अजनबीपन का अहसास लिए हुए." इस कथन में शब्द सरंचना का नमूना बेमिसाल है - "वो आपको देखेंगे और आप उन्हें भी, लेकिन संपर्क का तार टूटा ही रहता है. दोष उनका नहीं. यह गुज़ारे पल का अनचाहा हिसाब है.." रिश्तों के बीच की नाज़ुक कड़ियों को अपनी गहरी सोच के मंथन के उपरांत सुन्दर सलीके से शब्दों में बुनकर प्रस्तुत करने की यह सलाहियत अमरेंद्र जी की माहिरता में शामिल है.

कहानी "एक अरसे के बाद" पढ़ते हुए आभास हुआ कि जब मन में परिवार, परिवेश और आस-पास की स्थितियां चिंतन-मनन का कारण बन जाती हैं तब ही जाकर किसी रचना का निर्माण होता है, और अगर रचना सिलसिलेवार रूप से इंसान के साथ, उसके जीवन के साथ जुडी हुई होती है तो वह कहानी या उपन्यास का स्वरूप ले लेती है.
दो पीढ़ियों के बीच का अंतर, रिश्तों की नयी परिभाषा बनकर सामने आया है. बच्चों के लिए माँ-बाप धूप में साया, बरसात में छतरी, सर्दी में कम्बल, अकेले में अपना और क्लेश में संबल बन जाते हैं. पर जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तब बात वैसी नहीं रहती. उनकी मुट्ठी बड़ी हो जाती है और आशाएं-आकांक्षाएं उससे भी बड़ी..! पाने और खोने का सिलसिला नए क्षितिज की तलाश में रहता है. हर दिन ज़िंदगी नया मोड़ लेती है और नये अनुभव के दरवाज़े खोलती है. हर नई राह पर हर इन्सान का संघर्ष अपना अपना होता है, अपने हिस्से की जंग उसे लड़नी पड़ती है चाहे उसे हार मिले या जीत. यह नियति है. वैसे भी मन की यात्रा लम्बी और द्रुत होती है, कई दिशाओं वाली. रेगिस्तान में भटकता मुसाफिर, सहरा की प्यास लिए अपने प्रयासों से जब कभी एक शबनमी ठंडक पाता है तब भी उसे लगता है कि यह वह नमी नहीं जो वह तलाशता फिरता है. परिवार को सरल सुंदर ढंग से परिभाषित करते हुए लेखक कहानी 'आने वाले कल के लिए' में लिखा है--"परिवार दो व्यक्तियों के एक-दूसरे के प्रति विश्वास की बुनियाद पर टिका होता है. यह बुनियाद आपसी मतभेद और अहम् से हिलती है और समय रहते अगर नहीं बचाया गया तो परिवार बिखर जाता है." आगे इसी सिलसिले में उनका कथन--"नाव जब बिखरती है तो इस बात का कितना अर्थ रह जाता है की किसी किनारे के हिस्से में क्या आया."
सच ही तो है! क्या पता नियति ने अपने अंक में कितने तूफ़ान छुपा रखे हैं और देखते ही देखते वक़्त इंसान का कितना बड़ा हिस्सा खा जाता है. ऐसा ही तो हुआ है मशहूर फिल्म अभिनेता देवकुमार के साथ, जिसकी बेटी पारुल और पत्नी सुनयना की बेमौजूदगी ने उसके जीवन में वो खालीपन भर दिया जो ज़माने भर की दौलत और रौनकें न भर पायीं. परिवार के लोग आमने -सामने थे पर रिश्ते जैसी कोई बात नहीं रही. बहुत देर से उन्हें अहसास हुआ की आकाश अगर बुलंदी है तो धरती उसका आधार ! और फिर मिलने और बिछड़ने को भी तो कारण चाहिए. ऐसी रोचक कहानी जो पाठक को अपने बहाव में बहा ले जाने में सक्षम है के लिए अमरेन्द्र जी को बहुत बहुत बधाई.
हर विषय पर कलम चलने की माहिरता अमरेन्द्र जी की कहानियों की विषय-वस्तु में पाई जाती है. अब उनकी कलम की रवानी हमें बनारस की गंगा के किनारे ले जाती है जहाँ 'मोती बनाम मुक्तेश्वर' नमक कहानी का किरदार मोती, गिरि महाराज के आश्रम में रहता था, एक योगी जो पिछले जन्म की एक भूल की एवाज़ कुत्ते की योनि में जी रहा था. जीवन अच्छाई-बुराई का संगम है, जिसे समाज में रहते हुए लेखक की पैनी नज़र देखती है, बुराई के पीछे अच्छाई, अँधेरे के पीछे रोश्नी. जो कुछ भी वह महसूस करता है, लेखनी को माध्यम बनाकर पाठकों तक वही बात पहुंचता है. कहानी तभी प्रभावशाली होती है जब वह हमारी सोच को अपने तत्वों के माध्यम से बांधे रखती है. पात्र, उनकी शैली, उनके संवाद सभी तत्व कहानी को सशक्तता प्रदान करते हैं. अमरेन्द्र जी ने प्रवेश के पन्नों में भी लिखा है कि अच्छी कहानी कला और कथ्य के बीच एक संतुलन होना बहुत ज़रूरी है. पात्रों की निजी समस्या को, उलझनों, आस्थाओं और विश्वासों का बिम्ब शब्द शिल्प द्वारा ज़ाहिर हो उसके लिए ज़रूरी है कि कहानी की बुनियाद कसी हुई हो ताकि पढ़ते हुए किसी रिक्तता का आभास न हो.
अंत की ओर आते कहानी 'गांधीजी खड़े बाज़ार में' के कुछ अंश रोचक संवादों से मनोरंजन की दिशा दर्शा रहे हैं--ऐसे जैसे गांधीजी मनोरंजन की व्यवस्था का सामान बन कर रह गए हैं!! जिस जनता ने उन्हें 'बापू' और 'राष्ट्रपिता' का दर्जा दिया उसका आज यह हश्र है (इसे क्या कहें उपयोग, सदुपयोग, या दुरुपयोग!) कि सामाजिक दबाव के तहत किराये के गांधीजी पूरा समय झुककर खड़े रहे, कमर तक सीधी नहीं कर पाए, क्योंकि उनका झुक कर खड़े रहने का सौदा हुआ था और कम्पनी की इमेज बनाये रखने के लिए उन्हें झुककर ही खड़े रहकर, मुस्कराकर सभी का स्वागत करना पड़ा.
अमरेन्द्र की कहानियाँ प्रशांत नदी की समतल भूमि में बहती धाराओं की तरह हैं, जो कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ कह जाती हैं, मर्म को छूती हुई हमें प्रभावित ही नहीं, अभिभूत भी करती हैं. कारण है उनकी शब्दावली, शैली, सहजता, सरलता और निश्चलता. यह संग्रह अतीत की सम्रतियों और वर्तमान की अनुभूतियों की सुंदर पारदर्शी अभिव्यक्ति है. इस कहानी कलश के लिए उन्हें हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !!

देवी नागरानी
न्यू जर्सी, ४ अगस्त २०११, dnangrani@gmail.com
http://charagedil.wordpress.com/
http://sindhacademy.wordpress.com/

कहानी संग्रह-- गाँधीजी खड़े बाज़ार में, क़लमकार-अमरेंद्र कुमार, पन्ने-१२८, मूल्य : २०० रूपये, प्रकाशकः मेघा बुक्स, एक्स ११, नवीन शहादरा, दिल्ली 1100३२

Monday, November 1, 2010

मेरा दूसरा कहानी-संग्रह - गांधीजी खड़े बाज़ार में

मेरी कहानियों का दूसरा संग्रह "गांधीजी खड़े बाज़ार में " शीघ्र ही मेधा बुक्स से छप कर आ रहा है । पिछले संग्रह की तरह ही इसमें भी आठ कहानियां संग्रहीत है । प्रस्तुत है इस कहानी-संग्रह की भूमिका -

डिजिटल आर्ट : अमरेन्द्र कुमार, 2010


अपनी बात

मेरी कहानियों का दूसरा संग्रह आपके हाथों में है । एक कहानीकार का असली कथ्य उसकी कहानियां ही है फिर भी अपनी बात के माध्यम से कुछ साझा करना अच्छा लगता है ।

कहानी लिखना क्रिकेट में गेन्दबाजी की तरह लगता है । गेन्दबाज अगर तेज हुआ तो जिस तरह वह गेन्द फेंकने से पहले दौड़ लगाता है उसी तरह एक कहानीकार कहानी लिखने से पूर्व कहानी की पूरी योजना बनाता है। इसके पहले कहानियों के प्लॉट जहां कहीं और जब कभी उसे मिलते हैं उन्हें वह लिख कर रख लेता है। कहानी के प्लॉट अक्सर अक्स्मात ही आते हैं । कहीं कोई घटी घटना, प्रेरक प्रसंग, दृश्य अथवा मन के करीब की कोई विषय-वस्तु प्लॉट और बाद की कहानी के केन्द्र में होते हैं । तेज गेंदबाज जितनी लम्बी दौड़ लगाता है और संवेग प्राप्त करता है उतनी ही दक्षता के साथ वह गेंद को फेंक पाता है । इसी तरह एक अच्छा कहानीकार भी जितनी कहानियों को पढता और मनन करता है सम्भवत: वह भी उतनी अच्छी कहानी लिख पाता है । यह तो बात हुई कहानी लिखने से पहले की तैयारी की । गेंदबाज चाहे जितनी लम्बी दौड़ लगाये लेकिन अगर गेंद फेंकते हुए जरा सी चूक हो जाये तो गेंद "फुल टॉस" अथवा "शार्ट पिच" हो जाती है और बल्लेबाज द्वारा पिट जाती है । वैसे ही अगर कहानी लिखते हुए संतुलन बनाये रखने में थोड़ी चूक हो जाये तो कहानी के बिगड़ जाने की प्रायिकता बढ जाती है । इसी तरह एक दुर्बल कहानी पाठक की नापसन्द और आलोचक की आलोचना का शिकार हो सकती है जैसे बल्लेबाज कमजोर गेंद को दूर उछाल फेंकता है । एक दूसरे किस्म के गेंदबाज जिसे ’स्पिनर’ कहा जाता है वह दौड़ता तो दो कदम है लेकिन अपनी गेंद में ’स्पिन’ यानि ’पेंच’ डालकर वह उसे प्रभावशाली बनाता है । कहानी में भी कुछ सार्थक ’पेंच’ कहानी को प्रभावशाली बनाते हैं । कुछ गेंदबाज तेज गेंद में ’स्पिन’ दे सकते हैं वैसे ही कुछ कहानीकार भी कहानियों में संवेग और पेंच दोनों का बराबर प्रयोग करते हैं । इस अर्थ में एक अच्छी कहानी में कला और कथ्य के बीच एक संतुलन होता है ।

कहानी लिखना कई बार किसी अंजाने पहाड़ी रास्ते से गुजरने जैसा है । शुरु तो आप करते हैं लेकिन उसके रास्ते पहले से तय होते हैं । कहां पर मोड़ आयेगा, कहां पर चढ़ाई और कहां ढलान है इन पर कदाचित ही हमारा कोई अधिकार होता है । इतना जरूर है कि बहुत सी अनिश्चतत्ताओं के मध्य किसी जंगली फूल, कोई रंग-बिरंगी चिड़िया अथवा किसी पहाड़ी सोते अथवा झरने की तरह कुछ आश्चर्ययुक्त और सुखद चीज घट जाती है जिसकी कल्पना कभी किसी कहानी के प्लाट में नहीं की गयी होती । कहानी लिखना पहाड़ी यात्राओं की तरह ही श्रम-साध्य कार्य भी है । लेकिन जैसा कि हम किसी पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर शांत, तल्लीन और अंतर्मुखी हो जाते हैं कुछ-कुछ वैसी ही अनुभूति कहानी लिखने के उपरांत भी होती है।

कहानी लिखना एक तीर्थयात्रा भी है । तीर्थयात्रा में कोई अपना नहीं तो कोई पराया भी नहीं होता । यात्रा जैसे-जैसे आगे बढती है लोग मिलते और बिछड़ते जाते हैं। लेकिन वहां मिलने में न तो सुख होता है न ही बिछड़ने का कोई दु:ख । वैसे ही कहानियों की यात्रा में पात्र, परिवेश और समाज, यहां तक कि लेखक, पाठक और आलोचक सभी एक ही तीर्थ के सहयात्री की तरह हैं । पड़ाव सबके अलग-अलग हैं, कई बार रास्ते भी थोड़े अलग हो जाते हैं लेकिन लक्ष्य सबका एक ही होता है । कोई पहले शुरु करता है कोई देर से । कहानी को तो लक्ष्य तक एक कहानीकार पहुंचा देता है लेकिन क्या कहानीकार स्वयं अपने लक्ष्य तक पहुंच पाता है ? संभवत: उसकी कहानी ही बता सके कि वह अपने लक्ष्य से कितना पास अथवा दूर है ।

यह संग्रह अब जब तैयार है तो इसके पीछे कितने लोगों की प्रेरणायें और सहयोग हैं वह बताये बिना अपनी बात पूरी नहीं होगी । दिल्ली में डा. कमल किशोर गोयंका जी से भेंट के दौरान उन्होंने जो सुझाव दिये उनमें एक यह भी था कि पुस्तक नियमित रूप से प्रकाशित करवाते रहें । बाद में उन्होंने एक फोन संवाद में मेधा बुक्स, नई दिल्ली के श्री अजय कुमार जी का सम्पर्क दिया । पहली बार श्री अजय कुमार जी से जब फोन पर बात हुई तो उन्होंने दिल्ली में मिलने की बात कही । राउरकेला प्रवास के दौरान मैंने अपनी पाण्डुलिपि की प्रति अपने चाचा जी श्री कौशलेन्द्र कुमार सिन्हा को दी थी । चर्चा चाहे क्रिकेट मैच की हो अथवा भारत के समाज, राजनीति, बाजार अथवा साहित्य के बदलते परिदृश्य की सबमें वे सहर्ष और सहोत्साह शामिल रहते । बाद में पाण्डुलिपि की फोटो कापी कराने से लेकर डाक से मेधा बुक्स को भेजने का काम उनके कर्मचारी, खिलाड़ी, जो घर के सदस्य जैसा है, ने पूरा किया । अमेरिका लौटने से पहले समयाभाव में मेधा बुक्स के श्री अजय कुमार जी से मिलना नहीं हो पाया लेकिन इतना तो अवश्य है कि जितनी रूचि, आत्मीयता और परस्पर सम्मान की भावना उन्होंने दिखायी वह आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है । मैं आभारी हूं श्री अजय कुमार जी और उनके अनुज श्री दीपक मोंगा जी का जिनके माध्यम से इस संग्रह का प्रकाशन सम्भव हो रहा है।

अंत में, यह पुस्तक आप तक पहुंच नहीं पाती अगर जो मेरी प्रिय पत्नी हर्षा प्रिया और मेरा नन्हा पुत्र, अच्युतम, जो अब बीस माह को हो चुका है ने यह सब करने के लिये समय नहीं दिया होता । जितना समय मैंने इस पुस्तक के लिये दिया वह सब उनके हिस्से से ही तो आया । रसोई में काम करते हुए, घर को सम्भालते हुए और बच्चे को सुलाते हुए हर्षा मुझे देख जाती कि अगर मैं कहानी टाईप कर रहा हूं तो वह दबे पांव लौट जाती । और तो और नन्हा अच्युत भी लैपटॉप के पीछे से झांक जाता कि मैं कहानी ही टाईप कर रहा हूं कि बस इन्टरनेट भ्रमण में व्यस्त हूं !!

यह पुस्तक अब अपयुक्त हाथों में पहुंच रही है यही एक लेखक का पारिश्रमिक भी है और पुरस्कार भी ।

- अमरेन्द्र कुमार

Friday, October 15, 2010

परिवार और परिवेश का प्रतिबिम्ब - चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ - एक समीक्षा

समीक्षकः देवी नागरानी

अहले-जमीं से दूर रहने पर उसी दूरी का अहसास, जिये गये पलों की यादें - जिनकी इमारतें खट्टे-मीठे तजुर्बों से सजाई गयी है, उन बीते पलों की कोख से जन्म लेती है सोच, जो इस नये प्रवासी वातावरण में अपने आप को समोहित करने में जुटी है। यहां की ज़िंदगी, आपाधापी का रवैया, रहन-सहन, घर और बाहर की दुनिया की कशमकश ! और कशकश की इस भीड़ में जब इन्सान ख़ुद से भी बात करने का मौका नहीं पाता है तो सोच के अंकुर कलम के सहारे खुद को प्रवाहित करते हैं, प्रकट करते हैं।
कहानी लिखना - एक प्रवाह में बह जाना है। कल्पना के परों पर सवार होकर जब मन परिंदा परवाज़ करता है तो सोच की रफ़्तार अपने मन की कल्पना को इस तरह ख़यालों की रौ में बहा ले जाती है कि कल्पना और यथार्थ का अंतर मिटता चला जाता है। ऐसा कब होता है, कैसे होता है, क्यों होता है - कहना नामुमकिन है। लेखक जब ख़ुद अपनी रचना के पात्रों में इस कदर घुल-मिल जाता है तो लगता है एक विराट संसार उसके तन-मन में संचारित हुआ जाता है और फिर वहां मची हलचल को, उस दहकती दशा को कलम के माध्यम से अभिव्यक्त किये बिना उसे मुक्ति नहीं मिलती.
हर इन्सान के आस-पास और अन्तर्मन में एक हलचल होती है। सोचों की भीड़, रिश्तों की भीड़, पाबंदियों की भीड़, सुबह से शाम, शाम से रात, बस दिन ढलता है, सूरज उगता और फिर ढल जाता है और जैसे जैसे मानव-मन अपने परिवेश से परिचित होकर घुलता मिलता जाता है तो फिर एक अपनाइयत का दायरा बनने लगता है; मन थाह पाने लगता है।
जी हां ! कुदरत के सभी तत्त्वों के ताने-बाने से बुनी हुई ऐसी कहानियां, आधुनिक समाज में बदलते जीवन मूल्यों को रेखांकित करती हुई हमसे रूबरू हो रही है, श्री अमरेन्द कुमार के कहानी संग्रह "चूड़ीवाला और अन्य कहानियां" के झरोखों से। अमरेन्द्र जी का परिचय देना सूरज को उंगली दिखाने के बराबर है। संयुक्त राज्य अमेरिका से निकलने वाली त्रैमासिक हिंदी पत्रिकायें क्षितिज और ई-विश्वा के कुशल सम्पादक रहे हैं. उनकी कहानियों में एक ऐसी दबी चिंगारी पाई जाती है जो पाठक को अपनी आंच की लपेट में लेने से बाज नहीं आती। इस संग्रह में आठ कहानियां है जिनमें मेरी पसंदीदा रहीं - मीरा, चूड़ीवाला, चिड़िया, एक पत्ता टूटा हुआ, ग्वासी, रेत पर त्रिकोण ।
'मीरा' अमरेन्द्र जी की एक लम्बी कहानी है। एक तरह से कोई जिया गया वृतांत, जिसमें विस्मृतियों की अनेक गांठें परस्पर खुलती रहती है। इस संग्रह की भूमिका में उनके ही शब्दों में परतें खोलती हुई कलम कह उठती है - " कहानी मनुष्य की अनुभूत मनोदशाओं का एक पूरा दस्तावेज़ है। यह एक ऐसी दुनिया है जहां सब कुछ अपना है - पात्र, परिवेश, परिस्थ्ति, आरम्भ, विकास और परिणति " आगे उनका कथन है -" कहानी का अंत कभी नहीं होता, उसमें एक विराम आ जाता है। एक कहानी से अनेक कहानियां निकलती है.."
सच ही तो है ! उनकी कहानियां अपने जिये अनुभवों का एक लघु धारावाहिक उपन्यासिक प्रयास प्रस्तुत करती है जो शब्दों के सैलाब से अभिव्यक्त होता है जिसमें कहानी का किरदार, अपने आस- पास का माहौल, रहन- सहन, कथन-शैली से जुड़ते हुए भी किताना बेगाना रहता है। एक विडंबनाओं का पूरा सैलाब उमड़ पड़ता है कहानी 'मीरा' के दरमियान जिसमें समोहित है आदमी की पीड़ा, तन्हाईयों का आलम, परिस्थितियों से जूझते हुए कहीं घुटने टेक देने की पीड़ा, उसके बाद भी दिल का कोई कोना इन दशाओं और दिशाओं के बावजूद वैसा ही रहता है - "कोरा, अछूता, निरीह, बेबस और कमजोर"।
"मां नहीं रही.." खबर आई, समय जैसे थम गया, सांस अटक गयी, आंसू निकले और साथ में एक आर्तनाद" लेखक के पात्र का दर्द इस विवरण में शब्दों के माध्यम से परिपूर्णता से ज़ाहिर हो रहा है। आगे लिखते है " सब कुछ लगा जैसे ढहने, बहने, गिरने और चरमराने और मैं उनके बीछ दबता, घुटता, और मिटता चला गया " नियति की बख़्शी हुई बेबसी शायद इन्सान की आखिरी पूंजी है। मन परिन्दा सतह से उठकर अपनी जड़ों से दूर हो जाता है, लेकिन क्या वह बन्धन, उस ममता, उस बिछोह के दुख से उपर उठ पाता है ?
अतीत की विशाल परछाईयों में कुछ कोमल, कुछ कठोर, कुछ निर्मल, कुछ म्लान, कुछ साफ, कुछ धुंधली सी स्मृतियां, टटोलने पर हर मानव मन के किसी कोने में सुरक्षित पायी जाती है। दर्द के दायरे में जिया गया हर पल किसी न किसी मोड़ पर फिर जीवित हो उठता है । अमरेंद्र जी की क़लम की स्याही कहानी की रौ में कहती-बहती इसी मनोदशा से गुज़रे 'मीरा' के जीवन को रेखांकित कर पाई है, जो बचपन, किशोरावस्था से जवानी और फिर उसी उम्र की ढलान से सूर्योदय से सूर्यास्त तक का सफ़र करती है। कहानी में अमरेन्द्र ने अनुरागी मन के बंधन को खूब उभारा है जहां मीरा की सशक्तता सामने ज़िन्दा बनकर आती है - वहीं नारी जो संकल्पों के पत्थर जुटाकर, अपनी बिख़री आस्थाओं की नींव पर एक नवीन संसार का निर्माण करती है। मानवीय संबंधों की प्रभावशाली कहानी है 'मीरा' !
उम्र भी क्या चीज है - बदलते मौसमों का पुलिन्दा ! शरीर और आत्मा का अथक सफ़र जहाँ हर मोड़ पर एक प्रसंग की परतें खुलती हैं, वहीं दूसरे मोड़ पर एक अन्य कथा को जन्म देती है। जीवन के परिवेश के विविध रंगों के ताने-बाने से बुनी ये कहानियां कहीं प्रकृति के समुदाय के प्रभावशाली बिंब सामने दरपेश कर पाती है, कहीं चाहे अनचाहे रिश्तों की संकरी गलियों से हमें अपना अतीत दोहराने पर मजबूर करती है। कहानी 'चूड़ीवाला' एक और ऐसी कहानी है जिसका मर्म दिल को छू लेता है। इसके वृतांत में 'सलीम चाचा' नामक चूड़ी बेचनेवाले किरदार का ता-उम्र का सफ़र और सरमाया है जो उन्होंने बख़ूबी निभाया है सामने आया है, जिसने बालावस्था से वृद्धावस्था तक हर चौखट की शान को अपनी मान-मर्यादा समझा। एक मोड़ पर आकर उन्हें यह अहसास दिलाया जाता है कि "घर की बहू बेटियाँ उनकी बेची चीज़ों की खरीदार हैं और वे फ़कत बेचनेवाले" । इन्सान के तेवर भी न जाने कब मौसम की तरह बदल जाते हैं ! कभी एक ही चोट काफ़ी होती है बिखराव के लिये। ऐसा ही तूफान उमड़ा सलीम चाचा के मन में और वही उन्हें ले डूबा। परस्पर इन्सानी रिश्तों का मूल्यांकन हुआ जिसमें एक अमानुषता का प्रहार मानवता पर भारी साबित हुआ।
शैली और शिल्प का मिला जुला सरलता से भरा विवरण कहीं-कहीं अमरेन्द्र जी की कल्पना को यथार्थ के दायरे में लाकर खड़ा करता है - एक चलचित्र की तरह उनकी कहानी 'चिड़िया' में। जिसमें एक मूक गुफ़्तार होती है उस बेज़ुबान चिड़िया और कहानी के मूल किरदार के बीच; जहां एक नया रिश्ता पनपता है। ऐसा महसूस होता है कि स्वयं को सबसे विकसित प्राणी मानने वाले मनुष्य को भी अपने परिवेश से और बहुत कुछ सीखना बाकी है. एक संबंध जो मानव मन को एक साथ कई अहसासात के साथ जोड़ देता है, उस पल के अर्थ में अमरेन्द्र जी की भाषा ज्ञानार्थ को ढूंढ रही है, अपनी -अपनी कथा कहते हुए. जो सीमाओं की सीढ़ियाँ पार करते हुए शब्दावली की अनेक धाराओं की तरह निरंतर कल-कल बह रहीं हैं, उस चिड़िया के आने और न आने के बीच की समय गति में मानवीय मन की उकीरता, उदासी, तड़प, छटपटाहट शायद कलम की सीमा से भले परे हो, पर मन की परिधि में निश्चित ही क़रीब रही है. कहना, सुनना और सुनाना शायद इसके आगे निरर्थक और निर्मूल हो जाते हैं. रिश्ते में एक अंतहीन व्यथा-कथा शब्दों से अभिव्यक्त होकर मन के एक कोने में अमिट छाप बन कर बस जाती है.
सशक्त भाषा, पुरसर शैली और क़िरदार की संवाद शक्ति, शब्दों की सरलता इन कहानियों को पठनीय बनाती है. शब्द शिल्प की नागीनेदारी उन्हें और भी जीवंत कर देती है. कहानियों के माध्यम से लेखक अपने ही मन की बंधी हुई गांठें और मानव-मन की परतों को भी उधेड़ रहे हैं, उदहारण के लिए कहानी 'गवासी' ही लें. ज़मीन से जुडी यादें हरेक शख़्स की यादों के किसी हिस्से पर अधिकार रखती है और इंसान चाहकर भी ख़ुद को उन अधिकारों से वंचित नहीं रख पाता. ऐसी ही नींव पर ख़ड़ी है गवासी-एक इमारत जो स्मृतिओं के रेगिस्तान में अब भी टहलती है, बीते हुए कल के 'आज' भी जिसके आँगन में पदचाप किये बिना चले जाते हैं‍- जैसे किसी बुज़र्ग के फैले हुए दामन में, जो अपने परिवार को बिखरने से बचाने के लिए अपने अंत को टाले हुए है.
इस शैली के प्रवाह पर सोच भी चौंक पड़ती है, ठिठक कर रुक जाती है . "मृत्यु तो जैसे आ गयी, लेकिन जीवन ने जैसे आत्म-समर्पण करने से मना कर दिया हो...हाँ ऐसी ही है "गवासी" आश्चर्य चकित रूप में ख़ुद से जोड़ने वाली कहानी...कहानी कम..वृतांत ज़ियादा.
"एक पत्ता टूटा हुआ" काफ़ी हद तक मौसमों के बदलते तेवर दर्शाता हुआ वृतांत लगा. जो हवाओं के थपेड़ों के साथ जूझते हुए सोच की उड़ानों पर सवार होकर घर से दूर, मंजिल तक का सफ़र तय कर पाया है.
वो दर बदर, मकाँ बदर, मंजिल बदर हुआ
पत्ता गिरा जो शाख से जुड़ कर न ज़ुड़ सका
कथा में हास्य-रस का स्वाद भी ख़ूब है. एक पत्ता अपने-अपने जीवन के हर पहलू का बयाँ कर रहा है, स्नेह के छुहाव का, प्यार की थपथपी का, औरों के पावों तले रौंदे जाने पर चरमराहट का, किताबों की कैद से रिहाई पाने के बाद ठण्ड के अहसास का, बड़ा ही सहज और रोचक प्रस्तुतीकरण है. लेखक की यह ख़ूबी, पाठक को अपने साथ बाँध रखने की, अपने आप में एक मुबारक अस्तित्त्वपूर्ण वजूद रखती है. जहाँ उम्र भर का अनुभव पल में सिमट रहा हो, वहीं पलों की गाथा ता-उम्र के सफ़र में भी संपूर्ण नहीं होती. रेखांकित की गई विषय-वस्तु सजीव, हास्य-रस में अलूदा एक पत्ते की आत्मा-कथा का चित्रण अति प्रभावशाली सिलसिले की तरह चलता रहा.
कहानी "रेत का त्रिकोण" मानव- मन की दशा और दिशा दर्शाती है, बिछड़कर भी जुड़े रहने की संभावना की पेचकश है . कोई एक सूत्र है जो इंसान को इंसान से जोड़ता है, कोशिशें तो होंगी और होती रहेंगी, पर कब तक? क्या रेत के टीले पर बना भवन हवा के थपेड़ों से खुद को बचा पाया है? क्या रेत को मुट्ठी में कैद रख पाना संभव है? कई सवाल अब भी जवाब की तलाश में भटक रहे हैं, सर फोड़ रहे हैं. मानव- मन का प्रवाह अपनी गति से चल रहा है और भाषा का तरल प्रवाह पाठक के मन को मुक्ति नहीं दे रहा है.
"रेलचलित मानस" नामक कहानी अपने उन्वान का प्रतिबिम्ब है. दुनिया के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी भीड़ का एक हिस्सा है मानव. सफ़र में इस छोर से उस छोर तक का अनुभव ही ज़िन्दगी को मान्यता प्रदान करती है -जो आज के माहौल की आपाधापी में गुज़र जाती है, रूकती नहीं. जो गुज़रती रहे गुज़रने के पहले वही तो ज़िन्दगी है !
अमरेन्द्र जी की कहानियाँ अपनी विषय-वस्तु, वर्णन-शैली के कारण रोचक और पाठनीय है, कभी कहानियाँ एक दुसरे से जुडी हुई, ज़मीन से, जड़ से, मानवता से- जैसे जीवन की धार में अनुभव रुपी मोती पिरोये गए हैं . प्रकृति के हर एक मौसम का वर्णन प्रभावशाली बिम्ब बनकर सामने आता है. इन कहानियों की एक ख़ूबी यह भी है- वे जहाँ से शुरू होती हैं, वहीँ समाप्त होकर, और फिर वहीँ से प्रारंभ होने की सामर्थ्य भी रखती हैं. इस दिशा में एक कदम आगे और आगे बढ़ते रहे इसी शुभकामना के साथ

समीक्षकः देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू. एस. ए. dnangrani@gmail.com,
पुस्तकः चूड़ीवाला और अन्य कहानियाँ, लेखक; अमरेन्द्र कुमार, पन्नेः१७४, कीमतः रु॰125, प्रकाशकः पेंगुइन बुक्स एंड यात्रा बुक्स

Wednesday, July 21, 2010

भीड़

भीड़

(१)
भीड़ में नहीं होती कविता
भीड़ में होता है कोलाहल
कविता अमृत है नहीं हलाहल
अमृत अकेला ही होता है
मात्र विष इकठ्ठे होते हैं ।

(२)
कवियों की भीड़
लेखकों की भीड़
आलोचकों की भीड़
पुरस्कारों की भीड़
पत्रिकाओं की भीड़
संस्थाओं की भीड़
नेताओं की भीड़
स्वयंसेवकों की भीड़
संतों की भीड़
मठों की भीड़
ज्ञानियों की भीड़
मूर्खों की भीड़
भूखों की भीड़
अघायों की भीड़
कारों की भीड़
बजारों की भीड़
चिमनियों की भीड़
धुओं की भीड़
पेड़ काटने वालों की भीड़
पेड़ लगाने वालों की भीड़
हिंसकों की भीड़
अहिंसकों की भीड़
धरती दब रही है
गगन ढक रहा है
शरीर बढ रहा है
आत्मा दब रही है
समाज बंट रहा है
सरोकार घट रहा है
सब कुछ लौट आयेगा
मन की शांति
आत्मा का आलोक
आसमान को वायु
धरती की आयु
पेड़ को फूल-फल
सूखे घाटों का जल
अगर जो कम हो जाये
ये चतुर्दिक भीड़

(३)

मैं जीवन भर
दौड़ता रहा
जब से इस धरती पर आया
स्कूल की पढाई में
खेल-कूद में
गीत-संगीत में
बाद के दिनों में
कालेज में
नौकरी में भी
परिवार के पीछे
पड़ोसियों के आगे
देश और सीमा से परे
मैं दौड़ता गया
मैं दौड़ता गया
भीड़ में खो गया
पर एक दिन
मैं रुक गया
लोगों ने मुड़ कर देखा
दौड़ने वालों ने
ठहरे हुए लोगों ने
यहां तक जिन्होंने
दौड़ना शुरु भी नहीं किया था
सबने मुझसे कहा
भीड़ में पिछड़ जाओगे
एक जगह हो जड़ जाओगे
यहां तक कि सड़ जाओगे
लेकिन मैं जो रुका तो हिला नहीं
लोग मुझे देखते, ठहरते
कुछ सोचते फिर आगे बढ जाते
कुछ समय के बाद
वे लोग मुझे फिर मिले
जो मुझे छोड़ आगे बढे
क्योंकि दुनिया गोल है
वे कहने लगे कि
तू अभी भी यहीं पड़ा है
कब से सड़ रहा है।
मैं मुस्कराया
कुछ हंसे, कुछ रोये
लेकिन मैं जानता था
कि भाग वे रहे थे
मैं नहीं ।

Wednesday, June 9, 2010

एक दिन सुबह

अपनी नौकरी से रिटायर होने के बाद एक एकदम नये और अंजाने शहर में बसने का फैसला मेरा ही था। फैसलों में किसी की राय लेना और फैसला में उन राय-मशवरों की भूमिका में बहुत फर्क होता है। मैं नहीं चाहता था कि मेरी नौकरी और नौकरी से जुड़ी चीजे मुझे बाद के जीवन में दूर तक पीछा करे। यह खासकर बहुत सहज होता है उन नौकरियों में जिस तरह की नौकरी में मैं था। भारतीय प्रशासनिक सेवा में बहाली से लेकर, पचासों शहरों में सैकड़ों पदों पर काम करते हुए दिल्ली में सचिव बनने और फिर रिटायर होने के पहले के कुछ अंतिम दिनों तक जिस भूल-भूलैया से गुजरता हुआ मेरा जीवन बीता था उसे बाद में मैं बदले हुए रूप में बिताना चाहता था। बहुत लोग मेरे ही बैच के जो साथ में रिटायर हुए थे उनकी योजनायें आपस में मिलती थीं। उनमें से ज़्यादातर लोग मेट्रोपॉलटिन शहरों में बस गये, दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता आदि। कुछ अपने विदेश में रह रहे अपने बच्चों के पास चले गये। कुछ जो दक्षिण भारत से आये थे उन्होंने अपने क्षेत्र में लौटने का फैसला लिया था। आज कभी जब सोचता हँप तो लगता है कि रिटायर होने के पहले के कुछ दिनों और अपनी मसूरी में हुई ट्रेनिंग में कितना फर्क था। हालाँकि बहुत लोगों में वही ललक थी- नये सिरे से सब कुछ शुरू करने की। लेकिन, ज़्यादातर लोगों जिनसे मैं बाद के दिनों में भी सम्पर्क में रहा वे और उनके निर्णय किन्हीं और शर्तों पर आधारिँत थे। मेरे लिये भी मेरा यह फैसला इतना सहज न होता अगर संरचना, मेरी पत्नी, विदेश में मेरे बसे बच्चों के साथ रहने की इच्छा के बाद भी मेरे फैसले में मेरे साथ न रहती।
अंजाने शहरों में रहना मेरी आदत बन चुकी थी। पहले पढ़ने के लिये शहर-शहर मैं भटका उसके बाद नौकरी मिलने के बाद तो शहर बदलना जैसे नियति बन गया था। अलग-अलग शहर की अपनी एक पहचान होती है। पूरा शहर जैसे एक खास किस्म के राग या लय में बंधा-सा लगता है- एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक ही डोर से बंधा हुआ। प्रशासक होने के नाते आम लोगों के बीच में जाना अक्सर होता था लेकिन उनके जीवन में पैठ उतनी हो नहीं पाती थी कुछ प्रशासकीय व्यवधानों के कारण। लेकिन, समाचार पत्रों, प्रेस, मीडिया और स्थानीय नेताओं के जरिये, कभी उनकी समस्याओं तो कभी उनकी माँगों को लेकर शहर का ऐसा ताना-बुना मेरे सामने आता था जिससे मैं पहचान पाता था कि वह शहर किसी अन्य शहर से कितना भिन्न है या कितना समान।

गुड़गाँव के सेक्टर-१४ में एक फ्लैट में मैं और मेरी पत्नी और साथ में एक पुराना नौकर तीन ही लोग रह गये थे। यहाँ हमें आये हुए अभी तीन महीने ही हुए थे। बड़ा लड़का, अनीश और छोटी लडकी, क्षिप्रा मेरे रिटायरमेंट के समय अपनी छुट्टियों में अमेरिका और आस्ट्रेलिया से भारत आये हुए थे। और उन लोगों के रहते हुए ही हमलोग इस फ्लैट में आ गये थे। वे भी मेरी इस बात से सहमत थे कि दिल्ली के पास होने के साथ-साथ गुड़गाँव में रहना दिल्ली में रहने के बजाय सहज होगा। मेरी अंतिम पोस्टिंग दिल्ली में आज से पाँच साल पहले हुई थी। तभी लोगों ने मुझे दिल्ली में बस जाने के सुझाव दिये थे लेकिन मैं अपने उस निर्णय को अंत समय तक टालता रहा। यह नहीं कि दिल्ली में किसी प्रकार की असुविधा होती, लेकिन जैसा कि मैंने पहले बताया कि मैं अपनी नौकरी के दिनों की छाँह अपने रिटायरमेंट के दिनों पर नहीं पड़ने देना चाहता था।

जल्दी ही मुझे महसूस होने लगा कि रिटायरमेंट के बाद के जीवन में एक अजीब-सा खालीपन आ जाता है। खासकर जब कि मेरी नौकरी में पहले इतनी व्यस्ततायें थी कि कई बार दिन-महीने और साल का पता भी नहीं लगता था। ऑफिस के बाहर आम लोगों की भीड़ और भीतर फाईलों, आफ़िसरों, फोन और योजनाओं और उनकी पेचिदगियों के मध्य कभी पता न चला कि नौकरी के पैंतीस वर्ष कैसे बीत गये।

मेरी नींद सुबह जल्दी ही खुल जाती तो देखता कि संरचना पहले से उठ बैठी है। पैरों के जोड़ों में दर्द होने के बाद भी उसे बिस्तर पर ज़्यादा देर तक रहा नहीं जाता। खिड़की के परदे हटाकर देखता तो अंधेरा अभी छँटा भी न होता। मैं उठकर बाहर घर के पीछे के लॉन में चला जाता। सुबह की ठंडी हवा चेहरे पर तैरने लगती तो रात भर एयरकंडीशनर की हवा से शुष्क हुई त्वचा पर जैसे लगता कि कोई मरहम लगा रहा हो। मैं थोड़ी देर वहीं अप्रील की रात के नीचे बैठा रहता। आसमान में तारे छितरे जान पड़ते, बादलों की हस्ती कुछ धब्बों से ज़्यादा नहीं जान पड़ती। कहीं दूर किसी इक्के-दुक्के गाड़ियों के चलने की आवाज या किसी कुत्ते के भौंकने के सिवा सुबह की उस स्तब्ध नीरता में कोई अतिरिक्त हलचल नहीं होती। संरचना पीछे से आकर मेरे बगल में बैठ जाती। हम कितनी देर तक वहाँ बैठे रहते चुप-चाप। हमारी बातचीत के दायरे में अब बच्चों के कुशल-क्षेम के सिवा कुछ और न आ पाता। उनके फोन भी हर दूसरे दिन आ जाया करते थे इसलिये उनके लिये शुरू में होने वाली चिंता भी अब धीरे-धीरे तिरोहित होने लगी थी। ऐसे में बातों का कोई सूत्र हाथ न लगता देख हम में से कोई उठकर टहलने लगता या फिर ऐसी उलझन से ‘साहब चाय बना दूँ क्या?’ मनोहर की पेशकश हमें बचा ले जाती। मनोहर हमारा सबसे पुराना नौकर था जो आज भी हमारे साथ था। साथ से याद आया कि समय की लहरों में साथ की कितनी नौकायें समय से पहले ही तिरोहित हो गयी थीं। उनका हिसाब भी अब सम्भव नहीं था।

बाहर जब सुबह का उजाला फैलने को होता तो मैं तब तक तैयार होकर डायनिंग हॉल की मेज पर चश्मा लगाये अखबार पढ़ने लगता। मनोहर लाकर मेरी छड़ी दे देता तो मुझे लगता सुबह की सैर का समय हो गया है। पीछे से संरचना की कभी खांसने की तो कभी जोड़ों के दर्द की वजह से कराहने जैसी आवाज मेरा देर तक पीछा करती जब मैं अगली मोड़ तक नहीं पहुँच जाता। अप्रील की उस चमकीली सुबह में कंक्रीट की सड़क से उठती गरम धारायें शरीर को कभी-कभी सेंकती हुई-सी लगती। दिल्ली में पंडारा स्थित निवास के पास हरियाली होने के कारण सुबह कभी इतनी गर्मी नहीं लगती थी। लेकिन यहाँ हरियाली का कहीं नामो-निशान न था। हरियाली के नाम पर कुछ झुलसे हुए पेड़ और बाज़ार के पहले गुलमोहर का एक विशालकाय पेड़ ही था। मुझे कई बार लगता था कि गर्मी की तपिश में जहाँ सारे पेड़ मुरझा जाते थे वहीं गुलमोहर का पेड़ खिला-खिला सा रहता था। मैं चलते-चलते एक पल के लिये ठिठक कर गुलमोर के उस ढीठ पेड़ को देखता रहता। उसके हरे पत्ते के झुरमुट के बीच लाल-लाल फूल दल और दिमाग को बड़े सुकन देते थे।

पार्क जैसे-जैसे पास आता, वहाँ टहलने वालों की जानी-पहचानी सूरतें दिखायी देने लगतीं। अभी मेरी किसी से जान-पहचान नहीं थी इसलिये कुछ लोगों से मुस्कुरा भर लेने का ही नाता था। पार्क के गेट पर पहुँचते ही हवा के ठंडे झोंकों का रेला सा उठता। अन्दर पहुँचते ही तापमान में तीव्र गिरावट लक्षित हो जाती। मैं पार्क के दो-तीन चक्कर लगाने के बाद वहीं पास की बेंच पर देर तक बैठा रहता। कई लोग आते-जाते। कुछ दौड़ते थे तो कई लोग तेज़ कदमों से चलते थे पार्क के किनारे बनी पतली सड़क पर। कुछ लोग इतने धीमे टहलते कि लगता कि बस रस्म अदा कर रहे हों। मैं अपना ध्यान उनसे हटाकर अपने लिपटे हुए अखबार को खोल कर पढ़ने लगता। फिर तो मुझे ख्याल भी न रहता कि आस-पास क्या हो रहा है।

उस दिन सुबह मैं रोज की तरह पार्क के तीन चक्कर लगाने के बाद अखबार पढ़ रहा था कि कोई मेरी बेंच पर आकर मेरे बगल में बैठा था। मैंने ध्यान नहीं दिया होता अगर उन्होंने मुझसे अखबार माँगकर पढ़ने का अनुरोध न किया होता। मैं तब तक अखबार एक बार पढ़ने के बाद दोहरा रहा था इसलिये मैंने अपना पूरा अखबार सम्भालने के बाद उन्हें दे दिया। वे बहुत कम समय तक अखबार को देखते रहे, पढ़ने का उपक्रम करते लगे थे मुझे लेकिन मैं तब तक आने-जाने वालों को देखने लगा था। जल्दी ही उन्होंने अखबार को हम दोनों के बीच रखने के बाद कहा कुछ, ऐसा लगता था जैसे अखबार को साक्षी बनाकर वे कुछ कहना चाहते थे।

‘आपको पहले कभी देखा नहीं यहाँ, सेक्टर में आप नये आये हैं क्या?’

मैं मुड़ा था उनकी तरफ और उनका प्रश्नब मेरी चेतना से टकरा भर गया था, ‘माफ कीजियेगा, मैंने सुना नहीं। आपने कुछ पूछा था?‘

वे थोड़ी देर तक मुझे देखते रहे मानो तौल रहे हों कि वह प्रश्ने क्या फिर से पूछना ठीक होगा।

‘आप क्या यहाँ नये आये हैं?’
‘जी हाँ, मैं तीन महीने पहले ही इस सेक्टर में आया।’ मैंने कहा था। वह थोड़े उद्‌भ्रांत से लगते थे। दाढ़ी खिचड़ी थी और कुर्ता पायजामा पहने हुए थे। उम्र कोई पैंसठ-सत्तर साल रही होगी।
‘इसके पहले आप कहाँ....’ प्रश्ने पूरा करने से पहले उन्हें कुछ याद आ गया या कुछ और सोचने लगे लेकिन वह प्रश्नन देर तक हमारे और उनके बीच झूलता देख मैंने ही पहल की,
‘मैं इसके पहले दिल्ली में था।’ लेकिन वे अखबार के पन्नों को पलटते रहे जैसा अक्सर बातचीत के क्रम में सोचने के दौरान होता है। मैंने ज़ारी रखते हुए कहा, ‘आप तो काफी समय से होंगे इस शहर में?’
‘काफी समय....’ एक प्रश्नन उनके चेहरे पर तैर गया था, वे सोचते रहे लेकिन किसी नतीजे पर पहुँचते नहीं लगे तो मैंने कहा,
‘समय बहुत तेज़ी से गुज़र जाता है। और, हमें कई बार याद रखना मुश्किल हो जाता है कि कोई बात कब हुई थी।’ मैंने एक उच्छवास के साथ कहा।
उनकी आँखों में कुछ चमका था। वे मेरे पास थोड़े और खिसक आये। अखबार वहीं बेंच के किनारे रख छोड़ा था जो रह-रह कर फड़फड़ा उठता था।
‘आपको मैं बताऊँ तो मैं जालंधर का रहने वाला हूँ। यहाँ आये हुई कितने साल हुए मुझे ठीक से याद नहीं।’ फिर थोड़ा रुकते हुए बोले, ‘लेकिन मैंने स्कूल तक की पढ़ाई जालंधर में पूरी की थी। मुझे पढ़ने का बहुत शौक था।’ उनके स्वर में वही ललक थी जो अक्सर बढ़ते बच्चों में पायी जाती है जब उनसे कभी अपने कौशल के बारे में पूछा जाता है।
‘...और मैंने बहुत पढ़ाई भी की। मुझे नहीं पता कि आपने पढ़ाई कितनी की और आप क्या करते हैं लेकिन पढ़ना मेरे लिये ज़रूरत और शौक दोनों ही था।’

वह जब साँस लेने के लिये रुके तो मैंने कहा, ‘जी, अभी-अभी मैं रिटायर हुआ हूँ।’ वे मुझे देखते रहे, हल्की मुस्कान उनके होठों पर उतर आयी थी जो पपड़ायें होठों पर पूरी तरह फैल न सकी। फिर मेरे बोलने से पहले ही बोल उठे,

‘बाद में मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पी.एच.डी की डीग्री हासिल की।’ थोड़ा रुकने के बाद फिर बोलना शुरू किया, ‘उसके बाद मैंने वहीं पढ़ाना भी शुरू कर दिया था। बाद के दिनों में मैने जामिया मिलया इस्लामिया ...’ फिर अचानाक रुक गये, ‘आपने इस यूनिवर्सिटी के बारे में सुना होगा ‘ यह कहने के बाद भी वे मेरी तरफ देखते रहे जैसे प्रतीक्षा मेरे ‘हाँ ‘करने की कर रहे हों।

‘हाँ-हाँ यह तो बहुत ही चर्चित शिक्षा संस्थानों में से एक है।’ मैंने उन्हें आश्वास्त करते हुए कहा।
’वो सब तो ठीक है। लेकिन आज कल सब कुछ बदल रहा है। न तो अब वो पढ़ाने के तरीके रहे, पढ़ाने वाले रहे और न पढ़ने वाले।’ वे अचानक असंतुष्ट-से दीखे। हालाँकि यह उस प्रकार का असंतोष न था जो अक्सर ऑफिस या दोस्तों की महफिल में आम चर्चाओं के बीच उतर आता है। कहीं यह बात उनके दिल में लम्बे से कचोटती रही हो, ऐसा उनकी बातों से लगा। जब वे चुप हो गये तो मैंने कहा,
‘यह आप सही कह रहे हैं। लेकिन इसको इस अर्थ में भी लिया जा सकता है कि सभी कुछ परिवतर्नशील है। जो और जैसा पहले था वो अब नहीं हो सकता और जो अब और जैसा है वह आने वाले कल में भी वैसा नहीं रहेगा।’ मैंने कोई अलग और नयी बात नहीं कही थी और मुझे यह मालूम था लेकिन वे सहमत होते नहीं लगे।
‘खैर, मैं नहीं मानता कि हर बदलाव को हम स्वाभाविक मान लें। कुछ परिवर्तन एक खतरनाक षडयंत्र की तरह आता है या लाया जाता है। यह एक ऐसे धीमे ज़हर की तरह है कि हम मृत्यु की तरफ तो बढ़ते हैं लेकिन उसे हम विकास का नाम देते चलते हैं। क्या विकास सिर्फ समय के गुजरने के स्केल पर ही मापा जाना चाहिये?’ बोलते हुए उनके होठ थोड़े काँपने लगे तो उन्होंने उसे जीभ से तर कर लिया था। यह ऐसा विषय था जिसके बारे में एकदम से अपना मत दे पाना मुझे असम्भव जान पड़ा। मैं उनकी तरफ देखता रहा। मुझे निरूत्तर देख उन्होंने बातों का सिलसिला मोड़ दिया।
‘खैर, तो मैं यह बता रहा था कि मैंने जामिया मीलिया में कुछ वषों तक पढ़ाया। मैं पढ़ाने के साथ-साथ रिसर्च भी करता था। मैंने अपने रिसर्च के आधार पर दो पुस्कें भी लिखीं, ‘लाभ का मनोवैज्ञानिक पक्ष’, ‘व्यक्ति, समाज और स्वार्थ’। इसके अलावा मेरे बहुत से पेपर्स भी प्रकाशित हुए। कभी आप मेरे यहाँ आये तो मैं आपको दिखाऊँगा।’ कहकर वह मुस्कुराने लगे थे जैसे कि हम बचपन में अपने दोस्तों को अपने नायाब खिलौने के बारे में कुछ बता कर तो कुछ छुपा कर उन्हें ललचाना चाहते हैं।
‘लेकिन, मैं विकास के एक पक्ष से सहमत नहीं हूँ। आज जो हमारे समाज में मूल्यों की गिरावट एक परचून की दुकान से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के व्यापार और सौदों में दिखायी देती है वह विकास के एकपक्षीय प्रधानता के कारण ही है। किसी भी तरह सब कुछ भी पा लेने का होड़ ने एक ऐसी दौड़ में आज के व्यक्ति को धकेल दिया है जहाँ वह अगर भीड़ के साथ भाग नहीं सकता तो उसका कुचला जाना निश्चित है। ऐसे ही क्षण मैं उन पुराने मूल्यों की तरफ लौटने लगता हूँ जब कि हर कार्य को करने के पीछे एक बौद्धिक आधार होता था। जहाँ लोगों का कल्याण ही प्रमुख लक्ष्य हुआ करता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है।’ वे रुके तो मैंने घड़ी देखी, समय कुछ ज़्यादा न हुआ था लेकिन धूप तेज़ होने के कारण पार्क में लोग कम पड़ते जा रहे थे।
‘यह आप सही कह रहे हैं और भ्रष्टाचार भी उस लाभ का ही एक रूप है।’ मैंने उनके विचारों से सहमत जतायी तो वे हँसने लगे। कुछ कारणों से यह विषय मेरे अंतःकरण में भी एक लम्बे अंतराल से घुमर रहा था।
‘भ्रष्टाचार तो एक मियादी बुखार की तरह है। यह समाज में एक समय तक रहेगा ही जब तक हम उसकी तहों में जाकर उसे दूर नहीं करते। आपको मालूम होना चाहिये कि इन सबके पीछे आदमी का वही स्वार्थ है जिसे उसका एक स्वाभाविक लक्षण माना जाता है। यह एक सच है कि हर व्यक्ति के अन्दर स्वार्थ है। लेकिन उस पर काबू पाने के बजाय उसके अधीन हो जाना कायरता है और दगाबाजी है उनके लिये जिनसे वह जुड़ा है। क्योंकि यही स्वार्थ निकटतम सम्बंधों को भी ढहा देता है। और दुनिया का कोई कानून और विधि-व्यवस्था इसे दूर नहीं कर सकते। कुछ देशों ने तो भ्रष्टाचार को वैधानिक मान्यता भी दे दी है।’ वह उत्तेजना में एक हाथ को दूसरे पर ठोकते हुए सम्भल कर बैठ गये। उनके चेहरे के हर कोण से प्रसन्नता ऐसे छलक रही थी मानों कोई नया सूत्र हाथ लग गया हो, फिर कहने लगे, ‘लेकिन इससे भी निदान पाना सम्भव नहीं है। इसका एक ही उपाय है आदमी द्वारा अपने विवेक का सही प्रयोग। उसे पता होना चाहिये कि उसकी जरूरत से ज्यादा किसी चीज को पाना उसके और उसके परिवेश जिसका कि वह हिस्सा है उनके हित में नहीं। आपको मालूम नहीं इससे कितने ही भूखे और गरीब देशों का कल्याण हो जायेगा।’ वह बोल रहे थे और मैं सुन रहा था। ‘यह भी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि आदमी के अलावा संसार के किसी भी अन्य प्राणी में संग्रह करने का कोई प्रचलन नहीं है।’

ऐसा नहीं कि मैं सहमत नहीं था उनकी बातों से लेकिन अपने लम्बे समय के प्रशासनिक सेवा के अनुभव के केंद्र में कितनी ही ऐसी बातें मेरे सामने आती थीं जिनका उनके द्वारा की जा रही बातों से गहरा ताल्लुक था इसलिये मैं सुनना चाहता था। बहुत कम लोग होते हैं जो वही कहते हैं जो वे सोचते हैं। उनसे भी कम होते हैं जो वह सब करते हैं जो वे कहते हैं। लेकिन फिर एक प्रकार के विश्वा स में या आस्था में जो सुख है उसे कोरे तर्कों के आधार पर तौला नहीं जा सकता। और शायद वे भी इसी मनोदशा से गुजरे हों या गुजर रहे हों यह मेरा विश्वाधस नहीं तो अनुमान तो ज़रूर था।

वह थोड़ी देर चुप रहे, बन्द अखबार खोल कर देखा, पन्ने पलटते रहे फिर बन्द करके बगल में रख दिया। अब पार्क में इक्के-दुक्के लोग ही रह गये थे। मैंने भी घड़ी देखी और सोचा कि अब जाना चाहिये। मैंने उनकी तरफ देखा तो उनका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया। वे बदहवाश से उठ खड़े हुए। इसके पहले कि मेरी समझ में कुछ आये मैंने देखा दो लोग उन्हें जबरन कंधे से पकड़ कर ले जाने लगे। मैं हडबड़ा कर उठ खड़ा हुआ। मेरी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करूँ, कोई आस-पास भी नहीं दीखा जिनको बुला पाता। मैंने देखा जब वे लोगों द्वारा जबर्दस्ती लगभग घसीटे जा रहे थे तो उनकी आँखें मेरी तरफ थीं पर पिछले एक-आध घंटे में बनी उनमें पहचान कहीं भी न थी। था तो सिर्फ एक ऐसा खालीपन जो विस्मृति के कागारों से रिसता है, निरतर, निःशब्द...

वे नज़रों से ओझल भी न हुए कि किसी ने मेरे कंधे को छुआ था।

‘घबराईये नहीं। आप पहले बैठ जाईये। मैं आपको सब बताता हूँ।’

मेरे पैर काँप रहे थे यह मुझे तब पता चला जब मैं बेंच पर दुबारा आ बैठा। वे पहले से बेंच पर बैठे थे और उनकी हँसी लाख रोकने के बाद भी रुकती नहीं थी। जब वे थोड़े संयत हुए तो कहना शुरू किया, ’दरअसल आप नये हैं यहाँ इसलिये आपको कुछ भी नहीं मालूम। आप अभी जिनसे बात कर रहे थे और जिनको अभी जाते देखा है वे मेरे बड़े भाई साहब हैं।’ उनकी बातों को सुनकर मुझे जाने क्यों थोड़ी राहत मिली। लेकिन साथ में आश्चकर्य भी शायद इसलिये कि जिस तरह वह रह-रहकर हँसने लगते थे।
‘ओह, मैं ये जानता न था।’ मैंने अखबार के पन्नों को सहेजते हुए कहा, ‘लेकिन आपके भाई साहब बातें बहुत ते की कहते हैं।’
उन्होंने मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में एक शरारत भरी चमक आ गयी थी।
‘तो उन्होंने आपको भी वे सारी बातें बता दीं?‘
‘वे सारी बातें, मतलब मैं समझा नहीं ‘ मैं समझ नहीं पा रहा था वे आखिर कहना क्या चाहते थे।
‘तो उन्होंने कहा होगा कि वे जामिया मिलिया में पढ़ाते थे। और उन्होंने दो किताबें लिखी हैं। यही न?’
वे कहकर मुझे देखते रहे मानो कुछ रहस्योद्‌घाटन होने वाला हो।
‘हाँ, यही नहीं वे आज के समाज और उसकी सोच पर भी गहरी समझ रखते हैं, ऐसा मुझे लगा।’ मैंने अपनी बात पूरी की नहीं थी कि वे ठठाकर हँस पड़े। मैं हैरान कि इसमें इतना हँसने वाली क्या बात हो सकती है। वे कहने लगे,
‘भाई साहब, वे जामिया मिलिया में क्या पढ़ायेंगे उन्होंने कॉलेज तक का मुँह देखा नहीं। दसवीं कर रहे थे तो हमारे पिताजी लाखों का कारोबार छोड़ कर दुनिया से चल बसे। उसके बाद से ही वे कारोबार में जो आये तो निकल न पाये कभी। हाँ, वे हमेशा अफसोस ज़रूर करते रहे कि अगर किस्मत ने धोखा न दिया होता तो वे ज़रूर पढ़-लिख कर समाज को कुछ दे पाते।’ मुझे उनकी ये बातें एक सदमे से कम चौंकाने वाली नहीं लग रही थीं। एक पल के लिये मैं विश्वा स करने की स्थिति में नहीं था जो मैं देख और सुन रहा था लेकिन तब तक मेरे अन्दर पूरी बात जानने की उत्सुकत भी पैँदा हो गयी थी। वे बताते रहे,
‘लेकिन भाई साहब कारोबार में दुगुनी और रात चौगुनी तरक्की करते रहे। मैं भी उनके साथ-साथ था। लेकिन उनके काम करने के तरीके अलग थे। वे कारोबार में फायदे के सिद्धांत को लेकर हम सब से अलग सोच रखते थे और कारोबार में इमानदारी को सबसे ज़्यादा तरीजह देते थे। इसको लेकर कई बार हमारे साथ के व्यापारियों में कहा-सुनी भी हो जाती थी लेकिन वे अडिग रहते थे। समय गुजरता गया, हमारे परिवार बस गये। उनकी कोई संतान नहीं है। मेरे दो लड़के भी जल्दी-जल्दी ही इस कारोबार में हाथ बँटाने लगे थे। लेकिन बाद के समय में भाई साहब और उनमें मतभेद होने लगे।’ कहने के बाद वे रुके थे। बायें-दायें देखा और फिर कुछ सोचते हुए कहने लगे,
‘बाद में मेरे बेटों ने धोखा देकर उनको अपने कारोबार से बेदखल कर दिया।’ उनकी आवाज पहली बार संजीदा होने लगी थी।
‘तब से लेकर आजतक उनको उनके कमरे में एक तरह से कैद कर रखा है हमारे बेटों ने। धीरे-धीरे उनकी समझ-बूझ जाती रही। और उसके बाद से ही वे एक ऐसी दुनिया और ज़िन्दगी के बारे में लोगों को बताते हैं जिसे शायद वे जीना चाहते थे कभी....’ उनकी आवाज नम होने के साथ-साथ भारी भी हो रही थी। मैंने देखा उनकी तरफ जो अब बगल में देख रहे थे, शायद नज़र मिलाने की एक हिचक या कि कुछ न कर पाने का अपराध-बोध। मुझे कुछ कहते नही सूझ रहा था। तभी वही दो लोग जो पहले आये थे वे अब हमारे आगे आकर खड़े हो गये।
वे उठ खड़े हुए और कहते जा रहे थे, ‘देखो मैं उन्हें नहीं लाया। वे खुद निकलकर आये होंगे।’ लेकिन उन दोनों पर उनकी बातों का कोई असर होता नज़र नहीं आ रहा था और वे इस तरह से खड़े थे जैसे मोर्चे पर सिपाही सावधान मुद्रा में खड़े होते हैं। ये उनके चौकीदार या बॉडीगार्ड जो भी रहे हों लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव न था।
’देखिये, आप अभी चलिये हमारे साथ।’ उन दोनों ने एक ही साथ कहा।

उन्होंने मेरी तरफ एक कातर दृष्टि डाली और उनके साथ-साथ जाने लगे।

मैं अखबार लेकर उठ खड़ा हुआ। दिन की धूप सर पर चमक रही थी। मैं देर तक उन तीनों को पार्क के दरवाजे तक जाते देखता रहा और फिर मैं घर के लिये वापस चल पड़ा।

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